Monday, November 27, 2023

कठोतिया का अबोध बालक

 






 

कठोतिया, पहाड़ों से तीन ओर से घिरा हुआ, भोपाल से मात्र २० मिनट की दूरी पर स्थित एक गाँव है। दिन रविवार था और दीवाली की धूम धाम के बाद हमारी तलाश एक शांत जगह की थी। भोपाल के धुँधनुमा परिवेश से निकल कर खुले आसमान की खोज में दोस्तों और बेटे के साथ मैं सुबह कठोतिया की ओर चल दिया। 

समसगढ़ से होते एक सरकारी स्कूल के बाजू से जंगल में प्रवेश कर हम जैसे ही आगे बढ़े, हमें रेत पर कुछ पगमार्क दिखे। उन्हें क़रीब से देखने जब हम गाड़ी से उतरे तभी पास में एक मोटरसाईकिल पर सवार युवक भी वहाँ आकर रुक गया। उसने पगमार्क देखे और तत्काल घोषणां कर दी कि यह तो कुत्ते के पैरों के निशान हैं। हमारा रोमांच चरम पर था जो एक सीढ़ी नीचे के पायदान पर पहुँचा। जंगल, जंगल जैसा ही प्रतीत हो रहा था, तो वहाँ वन्यप्राणियों की उपस्तिथी भी अपेक्षित थी जिसके कारण हम भी उत्सुक थे। 

घने जंगल से गुजरते हुए आगे बढ़कर हम कठोतिया कैंप पहुँचे। इसे ईकोपर्यटन विभाग द्वारा बनाया गया है जहां अक्सर रोमांचक गतिविधियों के लिए शहर के लोग आते हैं। बारिश में बहते पानी की कल-कल के साथ यह स्थान अत्यधिक मोहक हो जाता है जो जनवरी तक रहा करता था पर इस बार पानी नवम्बर में ही सूख चुका था। 

कैंपिंग स्टेशन पर हमने अपने साथ लाये हुए कच्चे पपीता की सब्ज़ी, रोटी और चावल पकाने के लिए आग्रह किया जो वहाँ उपस्थित मदन द्वारा स्वीकार कर लिए गया। इधर ख़ाना तैयार हो रहा था और उधर हम टहलने के लिए निकल पड़े। जंगल में थोड़ा घूमने और पक्षी विहार के बाद जब सभी ने नींबू-पानी पीने का मन बना लिया तब गाँव के अंत में स्थित घर के आँगन में कुछ पेड़ दिखाई दिये। दूरी पर खड़े व्यक्ति से हमने चिल्लाकर पूछा, ‘नींबू है क्या?’

उसने जवाब दिया, ‘अरे भैया आइए ना।’

फिर क्या था हम लोग दौड़े वहाँ पहुँच गए। नाम पूछने पर पता चला की उसका नाम रौशन है। उसने हमें अपने बगीचे में आने का न्योता दिया और हम उसके पीछे चल दिए। रौशन ने वहाँ लगी कुछ अमरूद तोड़ी और हमें दे दी। तोते की खाई हुई अमरूद कुछ ज़्यादा ही मीठी थी। मेरे बेटे ने पेड़ से पहला नींबू तोड़ा और ख़ुशी से झूम उठा।

बाग की सैर के बाद हम उसके आँगन में बैठ गए। बाहर आँगन में ही उसके पिताजी बैठे थे। हमारे पहुँचते ही बिना यह सोचते हुए की हम पहली बार उनसे मिले थे उन्होंने गाँव की पूरी कहानी सुना दी और हमें कुछ खाने का न्योता दे दिया। रौशन के पिताजी की बातें सुनकर अमरूद की मिठास और बढ़ गई और थकान जैसे रफ़ू चक्कर हो गई। कुछ ही देर में रौशन का बेटा हमारे पास आ गया और उसने हमें अजनबी की तरह देखा और थोड़ी देर में आकर मेरे पास खड़ा हो गया। 

उसका नाम नैतिक था। उसकी शर्ट टाइट और पैंट कुछ ढीला था। लेकिन हमारी ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं रहा जब वह छोटा सा बच्चा सहजता से पास आ गया। फिर कुछ देर में उसने मेरे कंधे पर अपना हाथ रख दिया जैसे वह अरसे से परिचित हो। उसका भोलापन विश्वास में बदल गया और वह मेरे साथ बैठ गया। मैंने पूछा, ‘इतनी मिट्टी कैसे लग गई?’

‘दिन भर आँगन में खेलते हैं ये दोनों’, रौशन के पिता ने दूसरे बच्चे की और इशारा करते हुए कहा। उसकी जिज्ञासा से वह अबोध बालक सबके आकर्षण का केंद्र बन गया। बातों-बातों में मैं समझ गया कि भरपूर खेल-कूद के बाद, नैतिक का प्राकृतिक शृंगार पूरा हो चुका है और वह शीघ्र नहाने जाने वाला है।

वहाँ पहुँच कर उन लोगों की असाधारण प्रतिक्रिया देख कर ऐसा लगा जैसे वह अपना ही घर हो। उस घर के सभी लोगों की मिलनसारिता अद्भुत थी। ग्रामीण जनों के संग, गाँव में आज भी इतना अपना-पन महसूस होता है कि मानो पूरा विश्व ही आपका घर हो। आख़िर यही तो वसुधैव कुटुंबकम् है। रौशन के परिवार का धन्यवाद देते हुए हम वापस चल पड़े।

इधर ईकोपर्यटन सेंटर पर हमारा भोजन तैयार था। पक्षियों के चहचहाहट के बीच हमने आराम से भोजन ग्रहण किया। वहाँ उपस्थित मदन ने जब देखा की सब्ज़ी ख़त्म हो गई है तब वह एक अचार लेकर आ गया और उसने बहुत ही विनम्रता से अचार के साथ बची हुई रोटी खाने का प्रस्ताव रखा। उस अचार ने भोजन के अंत में हमारे मन में वो मिठास घोल दी जो शायद किसी मीठे से केवल स्वाद तक रह जाती। प्रकृति की गोद में सुकून के कुछ पल बिता कर थोड़ी देर में हम यादों की सुनहरी पोटली भर भोपाल की ओर रवाना हो गए।

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