Sunday, December 3, 2023

रातापानी का रणभैंसा


 बड़े सच ही कहते हैं - ख़ुशियों को ढूँढने दूर निकल जाने की आवश्यकता नहीं होती। कुछ ऐसा ही कहा जा सकता है भोपाल और उसके आस-पास के क्षेत्रों के लिए जिसे प्रकृति ने चारों ओर से उस सौंदर्य से सुसज्जित किया है जो आपको बिना अपवाद के सम्मोहित कर ही लेता है। 

रातापानी भोपाल से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित वन्यप्राणी अभयारण्य है जो रायसेन ज़िले के एक बड़े क्षेत्र में फ़ैला हुआ है। इस अभयारण्य के कई गेट हैं जहां से अंदर प्रवेश किया जा सकता है। इसका एक छोर झिरी गाँव में है जहां से वन विभाग द्वारा लोगों के लिए कुछ समय पहले सफारी प्रारंभ की गई है। झिरी रायसेन के छोर पर एक गाँव है जो दूसरी ओर सीहोर ज़िले से लगा हुआ है और तीसरी ओर कुछ दूरी पर भोपाल ज़िले से। भोपाल से इसकी निकटता इसे भोपाल से आने वाले पर्यटकों के लिए और आकर्षित बना देती है। 

हाल ही में मुझे अपनी बेटी के साथ इस आकर्षण के केंद्र - रातापानी को देखने और जानने का अवसर प्राप्त हुआ। मैंने इसके बारे में कुछ दोस्तों से सुना था और वहाँ जाने के लिए बहुत समय से इच्छुक था। छुट्टी की एक सर्द सुबह हमने अपना नाश्ता पैक किया और रातापानी की ओर निकल पड़े। बादलों से मौसम ख़ुशनुमा हो रहा था और थोड़ी बारिश भी हो गई थी जिसने हमारा रातापानी पहुँचना कुछ विलंबित कर दिया लेकिन हमारे रोमांच ने रातापानी के सफ़र को मनोरंजक बना दिया और हम शीघ्र झिरी गाँव में थे। वहाँ वन विभाग के कुछ मिलनसार अधिकारियों से मिलने के बाद झट-पट जिप्सी में बैठ हम जंगल के भीतर प्रवेश कर गये। आगे का सफ़र धीमी गति से बढ़ते हुए, हिचकोले खाते हुए जंगल के ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होते हुए रातापानी की सुचिता को निहारने और महसूस करने का था। इस सफ़र में रेंजर साहब, कार्तिकेय जी भी हमारे साथ हो लिए।



हम जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे वैसे-वैसे जंगल घना हो रहा था और हम मानो सभ्यता से दूर हो रहे थे। दूर-दूर तक किसी बसाहट का कोई निशान नहीं था। था तो बस पेड़-पौधों का घना घेरा, पक्षियों की चहचहाहट और जानवरों को ढूँढने का रोमांच। चलते- चलते कभी कोई एक पक्षी दिखता तो कभी कोई दूसरा जो महसूस कराता जा रहा था कि जिन पक्षियों के बारे में हम किताबों में पढ़ते हैं वे वास्तव में पाए जाते हैं। लेकिन किताबों के पन्नों से निकल कर पक्षियों का प्रत्यक्ष दिखना हमारी प्रसन्नता की मादकता को बढ़ा रहा था और हमें आनंद की अकल्पनीय अनुभूति करा रहा था।

फिर हम एक समतल मैदान पर पहुँचे जिसके अंत में एक बड़ी चट्टान थी, जहां से दूर-दूर तक सिर्फ़ हरे-भरे और ऊँचे-नीचे पेड़ और पहाड़ियाँ ही दिखाई दे रही थीं। वह दृश्य इतना सुंदर था कि हमसे वहाँ बिना रुके नहीं रहा गया। बेटी ने घर से लाया हुआ टिफ़िन खोला और उसमें से निकाल कर पोहा, जो अभी भी गर्म था, सभी के साथ साझा करते हुए मौसम और वृहिंगम दृश्य का लुत्फ़ लेते हुए खाया। कुछ देर रुकने, उस रमणीक दृश्य को निहारने एवं उसमें खो जाने के बाद हम आगे बढ़े। 



शांत पेड़ पौधों में अचानक कोलाहल होता और अचानक अनेकों पक्षियों का समूह उड़ कर अपनी उपस्थिति का आभास कराता। वह शोर हमारी उत्सुकता को बढ़ा देता था। हम सोचते कि क्या कोई बड़ा जानवर दिखने वाला है। एक पेड़ पर दिन में दुर्लभ प्रजाति के पाँच उल्लू देख हम अचंभित हुए। बस जंगल के बीच, इस उत्साह के मध्यम वेग से हम बढ़े जा रहे थे जैसे किसी समुद्र में लहरों के बीच जहाज ऊपर नीचे होता हुआ आगे बढ़ता है। कभी जंगली सुअर दिखता तो कभी कोई लंगूर। 



कुछ और आगे बढ़ने पर एक गाँव दिखाई दिया, जिसने हमें अचंभित किया लेकिन तभी कार्तिकेय ने बताया कि रातापानी में अभी भी कुछ गाँव हैं। उस छोटे से गाँव को पार कर थोड़ी दूर और जाने पर एक पत्थर पर हमारी नज़र गई जिसपर “रणभैंसा” लिखा हुआ था। मैंने पूछा, ‘रेंजर साहब, यह क्या है?’

‘यह बहुत पुरानी रॉक पेंटिंग है जिसे आज हम रणभैंसा के नाम से जानते हैं।’

‘क्या इसे देख सकते हैं?’

‘जी, मैं आपको वहाँ ले जाने वाला हूँ’, उनके यह कहते हुए ही गाड़ी बायें मुड़ गई और मुड़ते ही कुछ दूरी पर कुछ चट्टानें दिखाई दीं लेकिन आगे गाड़ी का रास्ता नहीं था। कार्तिकेय ने बताया कि आगे पैदल चलना होगा और हम पैदल चल दिये। कुछ कदम चलने पर हरे ऊँचे पेड़ों की काली छाँव के बीच दृश्य कुछ स्पष्ट हुआ। और हमने देखा कि कुछ कदम ऊपर चढ़ने पर चट्टान की मेहराब के भीतर एक बड़ा सा शैल चित्र बना हुआ है। और पास पहुँचे पर हमने पाया कि वह एक बहुत बड़े जानवर का चित्र है जो किसी गेंडे जैसा प्रतीत हो रहा है लेकिन उसके सींग भैंसे की तरह हैं। 



फिर कार्तिकेय ने उसके बारे में बताया और हम हैरान थे कि कैसे लोगों ने इतने वर्षों पहले उन चित्रों को इतने ऊपर बनाया और वे आज तक सुरक्षित हैं। उन्होंने हमें बताया कि घने जंगलों और जंगली जानवरों की वजह से ये अभी तक सुरक्षित रहा और अब वन विभाग इसकी देख रेख कर रहा है। उस चट्टान में अन्य तरह के भी चित्र थे। उनके अलग-अलग रंग, उनके अलग-अलग काल के होने का प्रमाण दे रहे थे। चित्रों का इतनी ऊँचाई पर बना होना उन्हें बनाने वाले लोगों की ऊँचाई का अनुमान प्रदर्शित कर रहा था। बेटी ने वहाँ बहुत से सवाल पूछे जिनके उसे बहुत सटीक उत्तर प्राप्त हुए। मुझे लगा कि बच्चों का प्रकृति के प्रति प्रेम जगाने का इससे अच्छा कोई विकल्प नहीं हो सकता कि वे स्वयं प्रकृति के बीच पहुँच जाएँ।



कुछ देर बाद जब कोई जानवर नहीं दिखा तो हम ऊँघने से लगे तभी किसी ने चिल्लाया - ‘वो देखो’।

जब तक हम देखते वहाँ कुछ और नहीं था बस केवल कुछ घाँस, और कुछ पेड़। जब मैंने पूछा ‘क्या था?’ तो जवाब मिला, ‘चौसिंगा था। क्या छलांग लगाई है उसने, बाड़े को लांघने के लिए वह 8 फिट ऊपर से कूद गया।’ यह सुनकर मेरी ऊँघ ग़ायब हो गई और मैं कुछ निराश हुआ कि मैंने उसे क्यों नहीं देखा। कार्तिकेय ने कहा, ‘सर, यहाँ सो नहीं सकते। जो सो गया वो खो गया।’ मैंने बेटी की तरफ़ देख उसकी आँखों में सहमति पढ़ते हुए हामी भरी और महसूस किया कि आपको यदि जंगल में कुछ देखना है तो चौकन्ने रहना पड़ेगा। 



फिर हम इमलाना कैम्प पर पहुँचे जहां एक वृद्ध व्यक्ति कैम्प की व्यवस्था सँभालता है और जंगल और जानवरों की सुरक्षा करता है। वह वन विभाग के प्रबंधन की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। वहाँ बांस से बने निरीक्षण कक्ष को देख कर बेटी उत्साह से अभिभूत होती हुई सीढ़ियों से ऊपर चढ़ गई। यह उसे उसके पसंदीदा ट्री हाउस जैसा अहसास करा रहा था। उसका कौतूहल देख कर ऐसा लगा जैसे उसके जंगल पहुँचने का लक्ष्य पूरा हो गया हो। 



वहाँ उस बाबा ने बेटी को एक कहानी सुनाई कि कैसे उसने एक इजिप्शन वल्चर के बच्चे को बड़ा किया। कार्तिकेय ने बताया कि वन विभाग ने उसका रेस्क्यू किया था और यहाँ लाकर रखा था क्योंकि वहाँ आस पास कुछ और भी ऐसे वल्चर पाए जाते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि उस इजिप्शन वल्चर को उसके पसंद का भोजन खिलाने के लिए वह प्रत्येक दिन उसके लिए एक मछली पकड़ता था और वह इजिप्शन वल्चर उस समय उसके साथ ही तालाब के किनारे बैठ जाया करता था। वह पक्षी का बच्चा भी उस स्नेह को जैसे समझता था और उस बाबा के साथ ही रहा करता था। वह बाबा जहां भी जाता पक्षी उसके पीछे पीछे चला करता। उड़ने लायक़ होने के बाद वह स्वच्छंद आसमान में घर की तलाश में निकल गया। 

मैंने पूछा, ‘क्या आपको लगता है कि वह वापस आएगा?’ बाबा ने जवाब दिया, ‘नहीं साहब, लगता तो नहीं लेकिन आ भी सकता है’, और यह कहते हुए जैसे वह उसकी याद में डूब गया। जानवर हमें कई बार असली मानवता सिखाते हैं। कितने महान होते हैं कुछ लोग जो अपने कार्य को पूजा की तरह करते हैं। हम सभी उसकी निष्ठा एवं कर्तव्य बोध से प्रभावित थे। 

लौटते समय बेटी को जब थकान भरी नींद आयी तो वह सहज ही सो गई। गाड़ी चलती रही। 20 मिनट बाद जब कार्तिकेय ने बताया कि कुछ दिन पहले उन्होंने वहाँ एक पेड़ पर तेंदुआ देखा था और वहाँ तेंदुए को देखने के बहुत आसार हैं। तब वह जाग गई और उत्साह से भरी आँखों से फिर जंगल के रोमांच को निहारने लगी। ऊँचे-नीचे, घुमावदार रास्तों से होते हुए कुछ देर में हम गेट पर वापस पहुँच गए। वापसी का सफ़र कितने जल्दी पूरा हो गया था।

इंटरनेट युग की गैजेट से भरी व्यस्त दुनियाँ में समय कितने जल्दी बीत जाता है लेकिन जंगल में कुछ घंटों तक मोबाइल से दूर रहने पर लगा कि जैसे हमने एक दिन नहीं एक अरसा वहाँ बिता दिया हो। हमें बच्चों को जंगल अवश्य ले जाना चाहिए। जंगल वो माध्यम है जिससे बच्चे प्रकृति से प्रेम करना सीख सकते हैं जो उन्हें शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक रोगों से दूर रखता है और उन्हें प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाता है।

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