Wednesday, January 17, 2024

राजधानी अयोध्या



भारत की असीम संपदा एवं वैभव ने दूसरे देशों से लोगों को सदियों से अपनी ओर आकर्षित किया है। वर्षों पूर्व भारत एक एकीकृत सांस्कृतिक क्षेत्र तो था लेकिन वह एक राष्ट्र नहीं था बल्कि कई छोटे-छोटे राज्यों के रूप में एक अघोषित गणराज्य जैसा था जिसपर किसी एक शक्तिशाली शासक का प्रभाव तो रहता था लेकिन सभी राज्यों को स्वतंत्रता भी काफ़ी थी। राष्ट्रीय स्तर का शासन अभाव होने से आक्रांता भी भारत की ओर आकर्षित हुए और एक शक्तिशाली केंद्र के आभाव में भारत पर हावी होने लगे और उन्होंने अंततः भारत पर क़ब्ज़ा स्थापित कर लिया और शासक बन गए। 


आक्रांताओं ने भारत की आत्मा को कुचलने के लिए उसके पूजा के स्थानों को बर्बाद करना प्रारंभ किया जिससे लोग भयभीत हो जाएँ और उनका धर्म बदल जाए। बदले हुए धर्म से आक्रांता अधिक निष्ठा की अपेक्षा कर रहे थे। इस प्रकार से यह उनकी दोहरी जीत होती। इसी क्रम में एक आक्रांता, बाबर ने भारत पर गहरा प्रहार करते हुए भारत के एक सबसे प्रिय नायक भगवान राम की जन्मभूमि पर अपने धार्मिक स्थल का निर्माण कर दिया। कई वर्षों तक राम का वह मंदिर वीरान हो गया।


राम को हिंदू विष्णु का अवतार मानते हैं और उनकी पूजा भी करते हैं। राम हिंदुओं के आदर्श हैं। वे अपने जीवन की प्रत्येक भूमिका में आदर्श रहे और इसीलिए वे हर भारतीय के लिए प्रेरणास्रोत हैं। कुछ लोगों को राम से कुछ शिकायत भी होती है फिर भी वे सभी के दिल में बसते हैं। ऐसा इसीलिए क्योंकि राम ने अनेकों समस्याओं से ग्रसित होने पर भी एक आदर्श आचरण कभी नहीं छोड़ा। राम की सम्पूर्ण भारत की यात्रा ने पूरे उपमहाद्वीप को एक धागे से पिरोने का कार्य किया। उन्होंने बुराई पर अच्छाई की जीत के लिए अपना सर्वस्व लगाया। 


रामलला का अयोध्या में पुनः विराजमान होना पूजा से बढ़कर हिंदू जाग्रति का प्रतीक है। ऐसा इसलिए क्योंकि वर्षों तक बिना किसी कारण के हिन्दू अपने इस आदर्श की ना केवल पूजा से वंचित रहे बल्कि आक्रांता के प्रहार, अंग्रेजों की विभाजनकारी नीतियों और आज़ादी के बाद की समस्याओं से अपने ही धर्म और धार्मिक अधिकारों से दूर हो गए। ऐसे में अयोध्या का पुनरुत्थान एक नए उदय का संकेत है। 


यह उदय पूर्व की भाँति किसी के विरुद्ध नहीं है। इसीलिए प्रत्येक भारतीय को इसका समर्थन करना चाहिए क्योंकि सभी भारतीय हिंदू ही तो हैं। जो स्वयं को कुछ और समझें वे केवल कट्टरवादी कहे जा सकते हैं। भारत में कट्टरता के लिए कभी जगह नहीं रही और ना रहेगी। 


सभी धर्मों को इसका दिल खोलकर इसलिए समर्थन करना चाहिए क्योंकि विरोध या समर्थन केवल यह दर्शाएगा कि वे आक्रांताओं को अपना मानते हैं या समान रक्त वाले अपने जैसे दिखने वाले लोगों को। उन्हें भूलना नहीं चाहिए कि उन्होंने धर्म बदला है रक्त नहीं। और कोई अन्य देश उन्हें धर्म के आधार पर ना तो अपने घर पर बैठाएगा, ना खिलाएगा और ना ही अपने देश में बसने के लिए जगह देगा। वो देश को उग्रवाद की आग में ढकेलने के लिए चंदा अवश्य दे देगा। लेकिन अब वो समय चला गया जब कोई ऐसा कर सके।


आइए हम सब मिलकर रामलला के विराजमान होने के इस अलौकिक क्षण में उत्सव मनाएँ। वे लोग भी इस समारोह का आनंद लें जो धार्मिक नहीं हैं क्योंकि यह केवल धर्म के लिए नहीं बल्कि इसका संबंध हमारे अस्तित्व और सम्मान से है। ये पल उस संस्कृति का प्रतीक भी है जिस संस्कृति ने हमें अपने-अपने विचार रखने और अपने अनुसार जीने की स्वतंत्रता दी है क्योंकि कोई और संस्कृति इतनी स्वतंत्रता देती ही नहीं है जितनी भारत की इस धरा से उपजने वाली। अन्यथा आज दूसरे कई देशों से अन्य धर्म ग़ायब नहीं हो जाते। हिंदू भारत कभी किसी और धर्म के इतने विरुद्ध नहीं हो सकता कि उसे जीने ही ना दे। यह भारत और भारतीय की संस्कृति नहीं है।


भारत में राम मंदिर का निर्माण हिंदुओं के उस सम्मान और गौरव का प्रतीक है जो समय के साथ बदलने की हिम्मत कर आगे की ओर देखता है। इस गौरव और सम्मान से दूसरे धर्मों का गौरव और सम्मान कम नहीं होता है।

Wednesday, January 10, 2024

आस्था, मनोरंजन एवं सांस्कृतिक विरासत का केंद्र - पुरी



आपके मन में भी ओडिशा का नाम लेते ही सबसे पहला विचार जगन्नाथ पुरी का आता होगा। 

हाल ही में जब मेरे विचारों में आस्था का समुंदर अपने ज्वार एवं भाटे के दृश्य गढ़ने लगा तब मैंने पुरी जाने का मन बनाया। बारीपदा से होता हुआ मैं परिवार के साथ पुरी पहुँचा। वैसे पुरी पहुँचने के लिए सड़क के अलावा ट्रेन एक सही माध्यम है और वायुमार्ग के लिए भुवनेश्वर का एयरपोर्ट भी मात्र 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थिति है।


पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर, भगवान जगन्नाथ, बलभद्र जी एवं सुभद्रा जी को समर्पित है। इसका निर्माण 12 शताब्दी में हुआ है। चार धाम में से एक जगन्नाथ पुरी अपनी अनूठी पहचान के लिए जाना जाता है। जैसे-जैसे मेरे कदम मंदिर की ओर बढ़ रहे थे वैसे-वैसे आस्था का सैलाब मन में उमड़ रहा था। मंदिर के शिखर पर स्थापित ध्वज दूर से ही दिखाई दे रहा था। नव वर्ष निकट होने के कारण मंदिर की ओर जाने वाले रास्तों पर भारी भीड़ थी। 


कुछ संघर्ष के उपरांत हम मंदिर परिसर के समीप पहुँचे। भीड़ में बच्चों को सँभालते हुए मैं अपने परिवार के साथ दर्शन कर गर्भ गृह से बाहर निकला। भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा ने हमारे मन पर ऐसा प्रभाव किया कि मंदिर से निकलने का मन नहीं किया और भक्ति ने हमें कुछ समय के लिए मंदिर परिसर में भगवान के ध्यान में लीन कर दिया। 


कुछ देर उपरांत जब हमने आस पास देखा तो पाया कि जगन्नाथ मंदिर परिसर में अन्य विभिन्न मंदिर हमारा ध्यान आकर्षित कर रहे थे। मंदिर की वास्तुकला कलिंग शैली की एक विशिष्ठ पहचान से हमें अवगत करा रही थी। मंदिर के ऊँचे शिखर, जटिल नक्काशीदार स्तंभ एवं पिरामिड संरचना हमें मंत्र मुग्ध कर रहे थे और हमारी संस्कृति की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से हमारा परिचय करा रहे थे।


मंदिर की भव्यता का प्रतिबिंब लोगों की आँखों में झलक रहा था। मंदिर के वास्तुशिल्प तत्वों में पौराणिक कहानियों का चित्रण, असंख्य मूर्तियाँ एवं नक़्क़ाशी प्राचीन ओडिशा के कारीगरों के द्वारा की गई जटिल विवरणयुक्त कला के कौशल को दर्शा रही थी। बिना कठिन परिश्रम के ऐसे चमत्कार गढ़ना आसान नहीं होता। हम सिर्फ़ कल्पना कर रहे थे कि क्यों इन्हें बनाने में कई वर्ष लगा करते थे। यह वास्तुकला ओडिशा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक अनूठा प्रमाण है।


हमने आगे बढ़ने पर पाया कि जगन्नाथ पुरी का प्रसिद्ध महाप्रसाद परोसने वाला रसोईघर और नरेंद्र नामक पोखर भक्तों से घिरा हुआ था। यहाँ के अनुष्ठान एवं धार्मिक महत्व इस मंदिर को एक प्रतिष्ठित सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक केंद्र बनाते हैं। जगन्नाथ पुरी की वार्षिक रथ यात्रा, जिसमें पूरे विश्व से लाखों लोग उपस्थित होते हैं, इसे विश्व प्रसिद्ध बनाती है। इस रथ यात्रा की गाथा इसके प्रति भक्ति का और गहरा भाव उत्पन्न कर देती है।


आस्था के साथ मनोरंजन का जो समागम पुरी में होता है वह संभवतः दुनिया के किसी और नगर में देखने को नहीं मिलता होगा। यहाँ एक ओर भक्ति में डूबने के लिए आस्था का अनंत सागर आपको आकर्षित करता है, वहीं दूसरी ओर विशाल एवं स्वच्छ समुद्र मनोरंजन में डूब जाने के लिए आपको सम्मोहित कर लेता है। पुरी के विशेष व्यंजन आपको प्रभावित करने से नहीं चूकते और मंदिर में भात का प्रसाद अपनी एक अलग पहचान रखता है।


दर्शन के उपरांत जब हम समुद्र के निकट पहुँचे तो पाया कि समुद्र के लंबे किनारों पर दूर दूर तक सुंदर नीला-हरा सा पानी दिखाई दे रहा है। समुद्र-तट सुंदर होने के साथ साफ़-सुथरा भी था। समुद्र और धरती के बीच असंख्य लोगों का जमावड़ा था। हर कोई समुद्र की लहरों के आनंद में डूबा हुआ था। वह दृश्य आपको पूरी तरह से तनाव मुक्त कर देता है। वहाँ इतनी भीड़ में भी डर का कोई भाव नहीं था। 


लोग उन्मुक्त से समुद्र का आनंद ले रहे थे और कोई रोक-टोक नहीं थी। अन्यथा समुद्र-तट पर सुरक्षा के प्रहरी लोगों को घुटने भर पानी के आगे जाने ही नहीं देते हैं। यहाँ भी सुरक्षा का ध्यान दिया जा रहा था लेकिन आम-जान की प्रसन्नता में कोई कठिनाई नहीं थी। जिससे मुझे आभास हुआ कि समुद्र-तटों पर सहज रोमांच की इतनी अनुभूति कम ही होती है। आगे बढ़ने पर समुद्र की ऊँची-ऊँची लहरें हमारे तन को पूरे मन से भिगा देती हैं और हमारे अहं को जैसे समुद्र की गहराइयों में डुबा देती हैं। समुद्र से नहा कर जो निकलता है वो प्रसन्नता से सराबोर एक हल्के मन का व्यक्तित्व होता है। 


 पुरी की यात्रा ने जहां हमें एक धार्मिक रंग में रंग दिया वहीं मंदिर की भव्यता ने हमें हमारी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व से भाव विभोर कर दिया। भारत को जितना देखो और जानों उतना ही यह बोध होता जाता है कि इसे और जानने की आवश्यकता है।

Tuesday, January 2, 2024

बांघवगढ़ का चिल्ला और पिल्ला




नाम में क्या रखा है। बात बांधवगढ़ में कुछ दिन पहले की है। 

गांव का नाम है चिल्लारी जहां एक मित्र ने बहुत सुंदर घोंसला बनाया है। गांव जैसा ही गांव का घर, चूल्हा-चौका, कुछ काम करने वाले स्थानीय लोग और ढेरों साग-सब्ज़ियों के बगीचों के बीच चहचहाती चिड़ियाएँ। उन्होंने मधुमक्खियों के पानी पीने के लिए विशेष ध्यान रखते हुए पत्थर पर पत्थर रखे हैं। वहाँ उनके मित्रों के रुकने के लिए एक अलग झोंपड़ी है जो कीट-पतंगों एवं छिपकलियों से बचाव के लिए ज़मीन से एक फिट की ऊंचाई पर बनाई गई है। 

उस झोपड़ी के नीचे स्वान का एक परिवार भी रह रहा था। दो छोटे पिल्ले जिनकी अभी आंख भी नहीं खुली थी। चलना तो दूर उनकी मां उन्हें सँभालकर अपने आस पास ही रख रही थी और यदा-कदा दूर रहते हुए भी समय-समय पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थी। 

कुछ देर में वहाँ भोपाल से दो बच्चियों का आगमन हुआ। एक चुस्त दुरुस्त, तेज़ दौड़ भाग करने वाली, अति उत्साही जिसकी आयु लगभग आठ वर्ष थी और दूसरी थोड़ी मनमौजी और शांत जिसकी आयु लगभग बारह वर्ष थी।दोनों कदमताल करती आगे-पीछे बढ़ती जा रही थीं मानो एक दूसरे की पूरक हों। एक स्थिर, दूजी चंचल। 

जैसे ही उनकी नज़र उन नन्हें शावकों पर पड़ी, वे दौड़ीं लेकिन थोड़े भय के साथ दोनों की ओर बढ़ीं। उन्होंने इनका नाम चिल्ला और पिल्ला रख दिया। उनकी माँ आस-पास नहीं थी और चिल्ला धीरे-धीरे बाहर की ओर सरक रहा था एवं पिल्ला घबराए उल्टी दिशा में दुबक रहा था। चिल्ला तेज़ और मिलनसार था और पिल्ला थोड़ा आरामपसंद। चिल्ला बिना डरे उन बच्चियों के पास पहुँचा और उनकी गोद में बैठ गया। 

बच्चियों ने चिल्ला के साथ काफी समय बिताया लेकिन चिल्ला बार-बार पिल्ला के पास जाता और उसके हाल-चाल देख कर लौट आता। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वह माँ की अनुपस्थिति में भाई की देखभाल कर रहा हो। 

उसकी सक्रियता देख दोनों लड़कियों ने चिल्ला को अपने साथ भोपाल ले जाने का मन बना लिया। यात्रा कैसे करनी होगी, चिल्ला कहां बैठेगा, कौन उसे सफर के दौरान संभालेगा सब कुछ फिक्स हो चुका था। और फिर आगे जो हुआ उसे आप जानकर खुश होंगे और निःशब्द भी ….

चिल्ला और पिल्ला लगभग एक माह के हो चुके हैं मां ने बाहर आना-जाना प्रारंभ कर दिया है। 

आग क्या हुआ होगा? आपको क्या लगता है