Friday, March 8, 2024

हर हर महादेव

 





चौरागड़ पचमड़ी में स्थित सतपुड़ा की दूसरी सबसे ऊँची चोटी है जहां देवों के देव महादेव का निवास है। हिंदू कैलेंडर के इस महत्त्वपूर्ण महाशिवरात्रि के दिन चौरागड़ की तलहटी में एक विशाल मेला आयोजित होता है जहां एक ही दिन में आस-पास के लाखों श्रद्धालु पहुँचते हैं। श्रद्धालु विशाल त्रिशूलों को लेकर चौरागड़ तक का सफ़र करते हैं और महादेव को प्रशन्न करने के लिए उसे मंदिर के पास स्थापित करते हैं। यह क्रम कई वर्षों से चला आ रहा है।

कालांतर में इन त्रिशूलों की संख्या इतनी अधिक होती गई कि बहुत से त्रिशूलों का उपयोग सीढ़ियों पर डिवाइडर के रूप में किया गया और कुछ का बाउंड्री बनाने में। लोगों की आस्था ने वहाँ इतना लोहा इकट्ठा कर दिया कि मंदिर के आस-पास के निर्माण के लिए शायद अब लोहा ले जाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती है। 

प्राकृतिक दृश्यों से परिपूर्ण चौरागड़ महादेव का यह सफ़र अद्भुत है। कभी बंदरों का समूह हमें सतर्क करता है तो कभी दोनों और गहरी खाई के बीच से होता हुआ ऊपर की और बढ़ता रास्ता। दूर-दूर तक पसरी शांति के मध्य “हर हर महादेव” के जयकारों के साथ जब हम मंदिर की ओर बढ़ते हैं और ईश्वर की प्रतिमा के दर्शन के लिए व्याकुल होते हैं तब चारों ओर पहाड़ों पर बिखरी हुई हरी चादर मन को सुकून प्रदान करती चली जाती है और हम मंत्र-मुग्ध से बिना थके बिना रुके बस आगे बढ़ते चले ज़ाते हैं।

मेले के समय पूरे रास्ते में दोनों ओर खाने-पीने, खिलौने, प्रसाद एवं अन्य उपयोगी वस्तुओं की दुकानें लगी रहती हैं। यह मेला स्थानीय लोगों के लिए एक अवसर होता है जब वे साल भर के लिए कुछ आमदनी इकट्ठी कर लेते हैं। बाक़ी पूरे वर्ष भी नींबू-पानी, बेर, ककड़ी, अमरूद या सीता-फल की दुकानें रास्तों को सुसज्जित करती हैं और राहगीरों का मनोरंजन करती हैं।

चूँकि यह स्थान सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व का हिस्सा है इसलिए फारेस्ट विभाग का अमला मेले के समय विशेषतौर पर यहाँ उपस्थित रहता है। मेला प्राधिकरण और प्रशासन मेले की संपूर्ण व्यवस्था करते हैं और पूरे समय एलर्ट रहते हैं। मैंने आभास किया है कि प्रशासन के लगातार प्रयासों से दिन-प्रतिदिन व्यवस्थाओं में सुधार होता गया है और आज हम यह कह सकते हैं कि इस स्थान के दर्शन के लिए एक स्थाई व्यवस्था स्थापित हो गई है।

मैं इस मंदिर में इतनी बार आ चुका हूँ कि अब गिनती याद नहीं लेकिन फिर भी मुझे यहाँ बार-बार आने की इच्छा होती है और हर बार लगता है जैसे कि मैं पहली बार आया हूँ। यह ऊँचाई पर स्थित मात्र एक मंदिर नहीं बल्कि आस्था का एक ऐसा केंद्र है जो प्रत्येक सीढ़ी चढ़ने पर आपको आध्यात्म की गहराई में ले जाता है और भावनाओं से सराबोर कर देता है। 

जब मंदिर में पहुँचकर हम अपनी आँखें बंद करते हैं और ईश्वर के ध्यान में लीन हो जाते हैं तब हम बार-बार अनुभव करते हैं कि जैसे हम किसी अनंत सागर की गहराई में चले जा रहे हों और फिर अंत में हमारे दिल के द्वार पर पहुँच गये हों। इसी प्रकार जब हम अपने दिल में झांकते हैं तब भी हम भावनाओं के महासागर से होते हुए फिर मंदिर में प्रकट होते हैं। इस भावना को व्यक्त करना इतना कठिन है कि बस मैं इतना कह सकता हूँ कि आप एक बार चौरागड़ महादेव जाइये और भावना के इस स्पंदन को स्वयं समझिए।

शिव आदि हैं, शिव अनंत हैं एवं शिव ही सत्य हैं।

Saturday, February 24, 2024

लाइफ एट ईशा …

 





5 दिवसीय ट्रेनिंग में मेरा ईशा योग केंद्र पहुँचने का संजोग बना। मैं कोयंबटूर पहुँचा, जहां से ईशा योग केंद्र 30 किमी दूर वेलियंग्री की तलहटी पर सदगुरू द्वारा स्थापित किया गया एक नया जीवन है। शहर को चीरता हुआ रास्ता, पहाड़ों की गोद में ऐसे रमणीय स्थान पर ले जाता है जिसकी मैंने कल्पना ही नहीं की थी। 


शाम के अंधेरे में योग केंद्र पर पहुँचकर पता चला कि सुबह ४ बजे सुबह उठना पड़ेगा। थोड़ा घबराते हुए मैंने रात्रि विश्राम किया। मैं अचंभित था जब पूरी अक्षीणता के साथ मेरी नींद खुली और मैंने देखा कि घड़ी में सुबह के 3:58 बज रहे थे। दो मिनट बाद ढोल नगाड़ों ने सुबह के माहौल में और अधिक ऊर्जा का संचार कर दिया। 5 बजे लोग तैयार होकर योगाभ्यास के लिए तैयार थे। कुछ साथियों से भेंट हुई जो बहुत दिनों बाद मिले थे। 

जब समय मिलने पर मैं भ्रमण के लिए निकला तब मैंने देखा कि कोई मंदिर के सामने योगाभ्यास कर रहा है, कोई सुंदर मंडप में वैदिक क्रिया कर रहा है, कोई हवन कर रहा है और कोई तालाब के किनारे ध्यान कर रहा है। आगे मैंने स्कूल, लाइब्रेरी एवं एक बड़ा भोजन कक्ष देखा जहां लोग आते, भोजन करते और चले जाते लेकिन कहीं भी गंदगी देखने नहीं मिली। 

आवश्यकताओं के लिए सुंदर दुकानें और वह सभी कुछ था वहाँ जो उस आश्रम को पूर्णता प्रदान करता है जैसे कोई छोटा सा स्वावलंबी देश हो। वहाँ मैं 2003 बैच के एक सीनियर आईएएस, अम्बरीश कुमार से मिला जिन्होंने तीन वर्ष के लिए अपनी सेवाएँ ईशा फाउंडेशन को दे दी है। मैं आश्चर्यचकित था। वे ईशा आउटरीच के प्रोजेक्ट डायरेक्टर हैं। देखने में एक साधारण संन्यासी लेकिन उनके विचार आकाश की ऊँचाइयों वाली प्रेरणा देने वाले थे।

ट्रेनिंग में आये प्रतिभागियों के लिए रुकने और भोजन के लिए अलग स्थान था। भोजन ऐसा था जिसमें सभी आवश्यक पोषक तत्वों का समावेश था। भोजन साधारण होते हुए भी ऐसा था कि स्वाद आपको आनंदित कर दे एवं जिसे ग्रहण कर कभी कोई भारीपन ना लगे। चुकंदर, गाजर, ककड़ी, सर्पगंधा इत्यादि की सलाद, नारियल चावल, दही लौकी, सब्ज़ियों का जूस, मूँगफली की खिचड़ी, धनिया की कॉफ़ी इत्यादि भोजन के कुछ विशेष व्यंजन थे।

इनर इंजीनियरिंग के योग कार्यक्रम में हम प्रतिदिन कुछ सीख रहे थे। सुबह दोपहर और शाम योग ध्यान में बीत रहा था एवं प्रतिदिन कुछ नया करने के लिए एक नई गतिविधि रहती थी जो आनंद की असीम व्यक्तिगत अनुभूति करा रही थी एवं जिज्ञासा को लगातार बांधे हुए थी। पहले दिन योग क्लास के बाद शाम को तीर्थकुण्ड में डुबकी लगाकर मन तरबतर हो गया। कुंड के ठंडे पानी ने शरीर को पूरी तरह हल्का कर दिया।

अगले दिन शाम को ध्यानलिंग पहुँच कर अनंत के स्पंदन ने मन को समस्त विकारों से दूर शून्य की ओर धकेल दिया। फिर शाम को लिंग भैरवी में आरती और दीपों के प्रकाश ने मन के प्रत्येक कोने को प्रज्वलित कर दिया। जब चाँदनी रात में हम लोग 112 फीट ऊँची अदियोगी की प्रतिमा के पास पहुँचे तो ऐसा लगा जैसे वह प्रतिमा जीवंत हो उठी हो। 

कभी हम सदगुरु से मिले तो कभी उनका सत्संग सुना। कभी हमने पूरे आश्रम को घूम कर देखा तो कभी योग सिखाने वाले स्वयंसेवियों ने मैदान में भरपूर खेल खिलाए। दौड़, फुटबॉल, बास्केट बॉल, टिप्पू इत्यादि खेल कर लगा जैसे हम बचपन में लौट गये हों। प्रतिदिन नित नए दर्शन होते चले गये और पता नहीं कैसे स्पंद हॉल में लगातार चली योग क्लास में हमने शांभवी महामुद्रा ध्यान पद्यति सीख ली। 

जब मैंने वापसी की यात्रा प्रारंभ की तो देखा कि ख़ाली हाथ योग केंद्र पहुँचे लोग, तन-मन की शुद्धि कर एक बहुमूल्य उपहार लेकर लौट रहे थे। ईशा फाउंडेशन कोयंबटूर कोई साधारण स्थान नहीं बल्कि जीवन के आनंद की खोज का एक विशेष पड़ाव है। 

Saturday, February 17, 2024

सूर्य की पहली किरण का मंदिर - कोणार्क





 सूर्य मंदिर ओड़िशा के समुद्र तट पर पुरी शहर से लगभग 35 किलोमीटर उत्तर पूर्व में 13वीं शताब्दी का मंदिर है। इसके निर्माण का श्रेय पूर्वी गंगावंश के राजा नरसिंह देव प्रथम को दिया जाता है। आप तेरहंवी सदी के राजा की दूरगामी सोच को महसूस करें। सृष्टि की ऊर्जा का केन्द्र सूर्य का मंदिर। इसे देखने की उत्सुकता हमें मंदिर तक ले आई। 

सूर्य मंदिर दक्षिण अमेरिका से लेकर अफ़्रीका और चीन तक बनाये गये। भारत में भी कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सूर्य मंदिरों का निर्माण हुआ। 

पत्थरों को तराश कर बनाया गया यह एक विशाल मंदिर है जिसमें बहुत से भव्य द्वार और विशाल मूर्तियाँ हैं। मूर्तिकला के माध्यम से यह जीवन के सार को प्रदर्शित करता है। रचनात्मकता एवं कलाकृति की दृष्टि से यह अद्भुत है।  


कोणार्क सूर्य मंदिर के निर्माण में दिशाओं का इस प्रकार से विशेष ध्यान रखा गया है कि किसी भी ऋतु में केवल सूर्य की किरणों से समय का अनुमान लगाया जा सके। इसके अलावा मंदिर में रथ के जो पहिये बने हैं वे जीवन के विभिन्न चरणों को दर्शाते हैं। 


कोणार्क पहुँचने पर मन में एक सवाल आया - भारत के इतने महत्वपूर्ण कला और विज्ञान के प्रतीक के बारे में स्कूल में हमें विस्तार से क्यों नहीं पढ़ाया गया जबकि कई और निरर्थक स्मारकों को पाठ्यक्रम में ज़्यादा महत्व दिया गया। कई ऐसे जो इतनी योग्यता भी नहीं रखते और जो केवल लोगों के दुखों की कहानियाँ सुनाते हैं। यह मंदिर सकारात्मक ऊर्जा का भंडार है। इस सूर्य मंदिर पर तो पीएचडी की पूरी थीसिस लिखी जा सकती है। 


मेरे बच्चों ने जब इसे देखा तब वे अत्यधिक प्रसन्न हुए और उत्साह से सराबोर होकर उन्होंने मुझसे ढेरों सवाल किए। प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर पाकर वे फोटोग्राफी में व्यस्त हो गये और मैं कला के विशाल समुद्र में गोते लगाने लगा। उनके सवालों से मुझे आभास हुआ कि प्रत्येक बच्चे को इसके बारे में जानना कितना आवश्यक है। स्कूल के पाठ्यक्रम में इसके बारे में और अधिक विस्तार से पढ़ाने की आवश्यकता है क्योंकि यह जिज्ञासा पैदा करता है और बच्चों में वैज्ञानिक सोच विकसित करने में बहुत सहायक है।


सूर्य मंदिर वो अनूठा स्थान है जहां आस्था और विज्ञान का समागम होता है। यह हमारी संस्कृति की वास्तविक सोच और कला का एक और उत्कृष्ठ उदाहरण है।

Wednesday, February 14, 2024

अब भव्य हिंदू मंदिर यूनाइटेड अरब एमिरात में

 




photo courtesy - x @AbuDhabiMandir

अब हम अचंभित करने वाली भविष्य में ऐसी और कल्पनाओं को साकार होते भी देख सकते हैं जैसे कि इस्लामिक गणराज्य में हिंदू मंदिर स्थापित होना जो मूर्तिकला का एक अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत करता है। अब यह एक चमत्कार ही कहा जा सकता है कि एक मुस्लिम देश में यह विशाल हिंदू मंदिर धर्म, आस्था, कला और अद्यात्म का एक नया केंद्र बनने जा रहा है। 

अबू धाबी के निकट स्वामी नारायण संस्था द्वारा बनाए जा रहे हिंदू मंदिर का भूमिपूजन प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सन् 2018 में किया था। अब यह मंदिर बनकर तैयार है एवं इसका लोकार्पण आज प्रधानमंत्री मोदी जी के द्वारा किया जाना है। 

कैसे नरेंद्र मोदी जी ने मुस्लिम शासकों को अबू धाबी में हिंदू मंदिर बनवाये जाने के लिये प्रेरित किया होगा? विचार करें। और कैसे स्वामी जी ने भारत के स्वाभिमान को वहाँ स्थापित करने के लिए जतन किए होंगे। यह मरुस्थल में एक मरीचिका की तरह लगता है।

मैं अपनी किताब के लिए स्वामी ब्रह्मविहारी जी से मिला था। मैंने साक्षात्कार के समय उनके व्यक्तित्व की गहराई को जाना था और इसीलिए यह भी कहना ग़लत नहीं होगा कि इस ऐतिहासिक कार्य के पीछे स्वामी नारायण संस्था के स्वामियों एवं उनके अध्यात्म की शक्ति का विशेष योगदान है, अन्यथा किसी का विश्वास जीतना आसान नहीं होता और धर्म के विषय में तो बिलकुल भी नहीं। 

यह मंदिर जहां एक ओर इस्लाम की उदारता को उजागर करता है वहीं दूसरी ओर संस्था के कौशल एवं सामर्थ को दर्शाता है। मंदिर की भव्यता संस्था की रचनात्मकता, अखंडता, गंभीरता, संवेदनशीलता एवं चरित्र की विशालता को दर्शाती है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं की शीघ्र ही इस मंदिर को देखने लाखों लोग वहाँ पहुँचने लगें।

तो क्या यूं कहें की रेत में भी कमल खिलाए जा सकते हैं।

Wednesday, January 17, 2024

राजधानी अयोध्या



भारत की असीम संपदा एवं वैभव ने दूसरे देशों से लोगों को सदियों से अपनी ओर आकर्षित किया है। वर्षों पूर्व भारत एक एकीकृत सांस्कृतिक क्षेत्र तो था लेकिन वह एक राष्ट्र नहीं था बल्कि कई छोटे-छोटे राज्यों के रूप में एक अघोषित गणराज्य जैसा था जिसपर किसी एक शक्तिशाली शासक का प्रभाव तो रहता था लेकिन सभी राज्यों को स्वतंत्रता भी काफ़ी थी। राष्ट्रीय स्तर का शासन अभाव होने से आक्रांता भी भारत की ओर आकर्षित हुए और एक शक्तिशाली केंद्र के आभाव में भारत पर हावी होने लगे और उन्होंने अंततः भारत पर क़ब्ज़ा स्थापित कर लिया और शासक बन गए। 


आक्रांताओं ने भारत की आत्मा को कुचलने के लिए उसके पूजा के स्थानों को बर्बाद करना प्रारंभ किया जिससे लोग भयभीत हो जाएँ और उनका धर्म बदल जाए। बदले हुए धर्म से आक्रांता अधिक निष्ठा की अपेक्षा कर रहे थे। इस प्रकार से यह उनकी दोहरी जीत होती। इसी क्रम में एक आक्रांता, बाबर ने भारत पर गहरा प्रहार करते हुए भारत के एक सबसे प्रिय नायक भगवान राम की जन्मभूमि पर अपने धार्मिक स्थल का निर्माण कर दिया। कई वर्षों तक राम का वह मंदिर वीरान हो गया।


राम को हिंदू विष्णु का अवतार मानते हैं और उनकी पूजा भी करते हैं। राम हिंदुओं के आदर्श हैं। वे अपने जीवन की प्रत्येक भूमिका में आदर्श रहे और इसीलिए वे हर भारतीय के लिए प्रेरणास्रोत हैं। कुछ लोगों को राम से कुछ शिकायत भी होती है फिर भी वे सभी के दिल में बसते हैं। ऐसा इसीलिए क्योंकि राम ने अनेकों समस्याओं से ग्रसित होने पर भी एक आदर्श आचरण कभी नहीं छोड़ा। राम की सम्पूर्ण भारत की यात्रा ने पूरे उपमहाद्वीप को एक धागे से पिरोने का कार्य किया। उन्होंने बुराई पर अच्छाई की जीत के लिए अपना सर्वस्व लगाया। 


रामलला का अयोध्या में पुनः विराजमान होना पूजा से बढ़कर हिंदू जाग्रति का प्रतीक है। ऐसा इसलिए क्योंकि वर्षों तक बिना किसी कारण के हिन्दू अपने इस आदर्श की ना केवल पूजा से वंचित रहे बल्कि आक्रांता के प्रहार, अंग्रेजों की विभाजनकारी नीतियों और आज़ादी के बाद की समस्याओं से अपने ही धर्म और धार्मिक अधिकारों से दूर हो गए। ऐसे में अयोध्या का पुनरुत्थान एक नए उदय का संकेत है। 


यह उदय पूर्व की भाँति किसी के विरुद्ध नहीं है। इसीलिए प्रत्येक भारतीय को इसका समर्थन करना चाहिए क्योंकि सभी भारतीय हिंदू ही तो हैं। जो स्वयं को कुछ और समझें वे केवल कट्टरवादी कहे जा सकते हैं। भारत में कट्टरता के लिए कभी जगह नहीं रही और ना रहेगी। 


सभी धर्मों को इसका दिल खोलकर इसलिए समर्थन करना चाहिए क्योंकि विरोध या समर्थन केवल यह दर्शाएगा कि वे आक्रांताओं को अपना मानते हैं या समान रक्त वाले अपने जैसे दिखने वाले लोगों को। उन्हें भूलना नहीं चाहिए कि उन्होंने धर्म बदला है रक्त नहीं। और कोई अन्य देश उन्हें धर्म के आधार पर ना तो अपने घर पर बैठाएगा, ना खिलाएगा और ना ही अपने देश में बसने के लिए जगह देगा। वो देश को उग्रवाद की आग में ढकेलने के लिए चंदा अवश्य दे देगा। लेकिन अब वो समय चला गया जब कोई ऐसा कर सके।


आइए हम सब मिलकर रामलला के विराजमान होने के इस अलौकिक क्षण में उत्सव मनाएँ। वे लोग भी इस समारोह का आनंद लें जो धार्मिक नहीं हैं क्योंकि यह केवल धर्म के लिए नहीं बल्कि इसका संबंध हमारे अस्तित्व और सम्मान से है। ये पल उस संस्कृति का प्रतीक भी है जिस संस्कृति ने हमें अपने-अपने विचार रखने और अपने अनुसार जीने की स्वतंत्रता दी है क्योंकि कोई और संस्कृति इतनी स्वतंत्रता देती ही नहीं है जितनी भारत की इस धरा से उपजने वाली। अन्यथा आज दूसरे कई देशों से अन्य धर्म ग़ायब नहीं हो जाते। हिंदू भारत कभी किसी और धर्म के इतने विरुद्ध नहीं हो सकता कि उसे जीने ही ना दे। यह भारत और भारतीय की संस्कृति नहीं है।


भारत में राम मंदिर का निर्माण हिंदुओं के उस सम्मान और गौरव का प्रतीक है जो समय के साथ बदलने की हिम्मत कर आगे की ओर देखता है। इस गौरव और सम्मान से दूसरे धर्मों का गौरव और सम्मान कम नहीं होता है।

Wednesday, January 10, 2024

आस्था, मनोरंजन एवं सांस्कृतिक विरासत का केंद्र - पुरी



आपके मन में भी ओडिशा का नाम लेते ही सबसे पहला विचार जगन्नाथ पुरी का आता होगा। 

हाल ही में जब मेरे विचारों में आस्था का समुंदर अपने ज्वार एवं भाटे के दृश्य गढ़ने लगा तब मैंने पुरी जाने का मन बनाया। बारीपदा से होता हुआ मैं परिवार के साथ पुरी पहुँचा। वैसे पुरी पहुँचने के लिए सड़क के अलावा ट्रेन एक सही माध्यम है और वायुमार्ग के लिए भुवनेश्वर का एयरपोर्ट भी मात्र 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थिति है।


पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर, भगवान जगन्नाथ, बलभद्र जी एवं सुभद्रा जी को समर्पित है। इसका निर्माण 12 शताब्दी में हुआ है। चार धाम में से एक जगन्नाथ पुरी अपनी अनूठी पहचान के लिए जाना जाता है। जैसे-जैसे मेरे कदम मंदिर की ओर बढ़ रहे थे वैसे-वैसे आस्था का सैलाब मन में उमड़ रहा था। मंदिर के शिखर पर स्थापित ध्वज दूर से ही दिखाई दे रहा था। नव वर्ष निकट होने के कारण मंदिर की ओर जाने वाले रास्तों पर भारी भीड़ थी। 


कुछ संघर्ष के उपरांत हम मंदिर परिसर के समीप पहुँचे। भीड़ में बच्चों को सँभालते हुए मैं अपने परिवार के साथ दर्शन कर गर्भ गृह से बाहर निकला। भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा ने हमारे मन पर ऐसा प्रभाव किया कि मंदिर से निकलने का मन नहीं किया और भक्ति ने हमें कुछ समय के लिए मंदिर परिसर में भगवान के ध्यान में लीन कर दिया। 


कुछ देर उपरांत जब हमने आस पास देखा तो पाया कि जगन्नाथ मंदिर परिसर में अन्य विभिन्न मंदिर हमारा ध्यान आकर्षित कर रहे थे। मंदिर की वास्तुकला कलिंग शैली की एक विशिष्ठ पहचान से हमें अवगत करा रही थी। मंदिर के ऊँचे शिखर, जटिल नक्काशीदार स्तंभ एवं पिरामिड संरचना हमें मंत्र मुग्ध कर रहे थे और हमारी संस्कृति की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से हमारा परिचय करा रहे थे।


मंदिर की भव्यता का प्रतिबिंब लोगों की आँखों में झलक रहा था। मंदिर के वास्तुशिल्प तत्वों में पौराणिक कहानियों का चित्रण, असंख्य मूर्तियाँ एवं नक़्क़ाशी प्राचीन ओडिशा के कारीगरों के द्वारा की गई जटिल विवरणयुक्त कला के कौशल को दर्शा रही थी। बिना कठिन परिश्रम के ऐसे चमत्कार गढ़ना आसान नहीं होता। हम सिर्फ़ कल्पना कर रहे थे कि क्यों इन्हें बनाने में कई वर्ष लगा करते थे। यह वास्तुकला ओडिशा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक अनूठा प्रमाण है।


हमने आगे बढ़ने पर पाया कि जगन्नाथ पुरी का प्रसिद्ध महाप्रसाद परोसने वाला रसोईघर और नरेंद्र नामक पोखर भक्तों से घिरा हुआ था। यहाँ के अनुष्ठान एवं धार्मिक महत्व इस मंदिर को एक प्रतिष्ठित सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक केंद्र बनाते हैं। जगन्नाथ पुरी की वार्षिक रथ यात्रा, जिसमें पूरे विश्व से लाखों लोग उपस्थित होते हैं, इसे विश्व प्रसिद्ध बनाती है। इस रथ यात्रा की गाथा इसके प्रति भक्ति का और गहरा भाव उत्पन्न कर देती है।


आस्था के साथ मनोरंजन का जो समागम पुरी में होता है वह संभवतः दुनिया के किसी और नगर में देखने को नहीं मिलता होगा। यहाँ एक ओर भक्ति में डूबने के लिए आस्था का अनंत सागर आपको आकर्षित करता है, वहीं दूसरी ओर विशाल एवं स्वच्छ समुद्र मनोरंजन में डूब जाने के लिए आपको सम्मोहित कर लेता है। पुरी के विशेष व्यंजन आपको प्रभावित करने से नहीं चूकते और मंदिर में भात का प्रसाद अपनी एक अलग पहचान रखता है।


दर्शन के उपरांत जब हम समुद्र के निकट पहुँचे तो पाया कि समुद्र के लंबे किनारों पर दूर दूर तक सुंदर नीला-हरा सा पानी दिखाई दे रहा है। समुद्र-तट सुंदर होने के साथ साफ़-सुथरा भी था। समुद्र और धरती के बीच असंख्य लोगों का जमावड़ा था। हर कोई समुद्र की लहरों के आनंद में डूबा हुआ था। वह दृश्य आपको पूरी तरह से तनाव मुक्त कर देता है। वहाँ इतनी भीड़ में भी डर का कोई भाव नहीं था। 


लोग उन्मुक्त से समुद्र का आनंद ले रहे थे और कोई रोक-टोक नहीं थी। अन्यथा समुद्र-तट पर सुरक्षा के प्रहरी लोगों को घुटने भर पानी के आगे जाने ही नहीं देते हैं। यहाँ भी सुरक्षा का ध्यान दिया जा रहा था लेकिन आम-जान की प्रसन्नता में कोई कठिनाई नहीं थी। जिससे मुझे आभास हुआ कि समुद्र-तटों पर सहज रोमांच की इतनी अनुभूति कम ही होती है। आगे बढ़ने पर समुद्र की ऊँची-ऊँची लहरें हमारे तन को पूरे मन से भिगा देती हैं और हमारे अहं को जैसे समुद्र की गहराइयों में डुबा देती हैं। समुद्र से नहा कर जो निकलता है वो प्रसन्नता से सराबोर एक हल्के मन का व्यक्तित्व होता है। 


 पुरी की यात्रा ने जहां हमें एक धार्मिक रंग में रंग दिया वहीं मंदिर की भव्यता ने हमें हमारी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व से भाव विभोर कर दिया। भारत को जितना देखो और जानों उतना ही यह बोध होता जाता है कि इसे और जानने की आवश्यकता है।

Tuesday, January 2, 2024

बांघवगढ़ का चिल्ला और पिल्ला




नाम में क्या रखा है। बात बांधवगढ़ में कुछ दिन पहले की है। 

गांव का नाम है चिल्लारी जहां एक मित्र ने बहुत सुंदर घोंसला बनाया है। गांव जैसा ही गांव का घर, चूल्हा-चौका, कुछ काम करने वाले स्थानीय लोग और ढेरों साग-सब्ज़ियों के बगीचों के बीच चहचहाती चिड़ियाएँ। उन्होंने मधुमक्खियों के पानी पीने के लिए विशेष ध्यान रखते हुए पत्थर पर पत्थर रखे हैं। वहाँ उनके मित्रों के रुकने के लिए एक अलग झोंपड़ी है जो कीट-पतंगों एवं छिपकलियों से बचाव के लिए ज़मीन से एक फिट की ऊंचाई पर बनाई गई है। 

उस झोपड़ी के नीचे स्वान का एक परिवार भी रह रहा था। दो छोटे पिल्ले जिनकी अभी आंख भी नहीं खुली थी। चलना तो दूर उनकी मां उन्हें सँभालकर अपने आस पास ही रख रही थी और यदा-कदा दूर रहते हुए भी समय-समय पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थी। 

कुछ देर में वहाँ भोपाल से दो बच्चियों का आगमन हुआ। एक चुस्त दुरुस्त, तेज़ दौड़ भाग करने वाली, अति उत्साही जिसकी आयु लगभग आठ वर्ष थी और दूसरी थोड़ी मनमौजी और शांत जिसकी आयु लगभग बारह वर्ष थी।दोनों कदमताल करती आगे-पीछे बढ़ती जा रही थीं मानो एक दूसरे की पूरक हों। एक स्थिर, दूजी चंचल। 

जैसे ही उनकी नज़र उन नन्हें शावकों पर पड़ी, वे दौड़ीं लेकिन थोड़े भय के साथ दोनों की ओर बढ़ीं। उन्होंने इनका नाम चिल्ला और पिल्ला रख दिया। उनकी माँ आस-पास नहीं थी और चिल्ला धीरे-धीरे बाहर की ओर सरक रहा था एवं पिल्ला घबराए उल्टी दिशा में दुबक रहा था। चिल्ला तेज़ और मिलनसार था और पिल्ला थोड़ा आरामपसंद। चिल्ला बिना डरे उन बच्चियों के पास पहुँचा और उनकी गोद में बैठ गया। 

बच्चियों ने चिल्ला के साथ काफी समय बिताया लेकिन चिल्ला बार-बार पिल्ला के पास जाता और उसके हाल-चाल देख कर लौट आता। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वह माँ की अनुपस्थिति में भाई की देखभाल कर रहा हो। 

उसकी सक्रियता देख दोनों लड़कियों ने चिल्ला को अपने साथ भोपाल ले जाने का मन बना लिया। यात्रा कैसे करनी होगी, चिल्ला कहां बैठेगा, कौन उसे सफर के दौरान संभालेगा सब कुछ फिक्स हो चुका था। और फिर आगे जो हुआ उसे आप जानकर खुश होंगे और निःशब्द भी ….

चिल्ला और पिल्ला लगभग एक माह के हो चुके हैं मां ने बाहर आना-जाना प्रारंभ कर दिया है। 

आग क्या हुआ होगा? आपको क्या लगता है