आपके मन में भी ओडिशा का नाम लेते ही सबसे पहला विचार जगन्नाथ पुरी का आता होगा।
हाल ही में जब मेरे विचारों में आस्था का समुंदर अपने ज्वार एवं भाटे के दृश्य गढ़ने लगा तब मैंने पुरी जाने का मन बनाया। बारीपदा से होता हुआ मैं परिवार के साथ पुरी पहुँचा। वैसे पुरी पहुँचने के लिए सड़क के अलावा ट्रेन एक सही माध्यम है और वायुमार्ग के लिए भुवनेश्वर का एयरपोर्ट भी मात्र 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थिति है।
पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर, भगवान जगन्नाथ, बलभद्र जी एवं सुभद्रा जी को समर्पित है। इसका निर्माण 12 शताब्दी में हुआ है। चार धाम में से एक जगन्नाथ पुरी अपनी अनूठी पहचान के लिए जाना जाता है। जैसे-जैसे मेरे कदम मंदिर की ओर बढ़ रहे थे वैसे-वैसे आस्था का सैलाब मन में उमड़ रहा था। मंदिर के शिखर पर स्थापित ध्वज दूर से ही दिखाई दे रहा था। नव वर्ष निकट होने के कारण मंदिर की ओर जाने वाले रास्तों पर भारी भीड़ थी।
कुछ संघर्ष के उपरांत हम मंदिर परिसर के समीप पहुँचे। भीड़ में बच्चों को सँभालते हुए मैं अपने परिवार के साथ दर्शन कर गर्भ गृह से बाहर निकला। भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा ने हमारे मन पर ऐसा प्रभाव किया कि मंदिर से निकलने का मन नहीं किया और भक्ति ने हमें कुछ समय के लिए मंदिर परिसर में भगवान के ध्यान में लीन कर दिया।
कुछ देर उपरांत जब हमने आस पास देखा तो पाया कि जगन्नाथ मंदिर परिसर में अन्य विभिन्न मंदिर हमारा ध्यान आकर्षित कर रहे थे। मंदिर की वास्तुकला कलिंग शैली की एक विशिष्ठ पहचान से हमें अवगत करा रही थी। मंदिर के ऊँचे शिखर, जटिल नक्काशीदार स्तंभ एवं पिरामिड संरचना हमें मंत्र मुग्ध कर रहे थे और हमारी संस्कृति की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से हमारा परिचय करा रहे थे।
मंदिर की भव्यता का प्रतिबिंब लोगों की आँखों में झलक रहा था। मंदिर के वास्तुशिल्प तत्वों में पौराणिक कहानियों का चित्रण, असंख्य मूर्तियाँ एवं नक़्क़ाशी प्राचीन ओडिशा के कारीगरों के द्वारा की गई जटिल विवरणयुक्त कला के कौशल को दर्शा रही थी। बिना कठिन परिश्रम के ऐसे चमत्कार गढ़ना आसान नहीं होता। हम सिर्फ़ कल्पना कर रहे थे कि क्यों इन्हें बनाने में कई वर्ष लगा करते थे। यह वास्तुकला ओडिशा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक अनूठा प्रमाण है।
हमने आगे बढ़ने पर पाया कि जगन्नाथ पुरी का प्रसिद्ध महाप्रसाद परोसने वाला रसोईघर और नरेंद्र नामक पोखर भक्तों से घिरा हुआ था। यहाँ के अनुष्ठान एवं धार्मिक महत्व इस मंदिर को एक प्रतिष्ठित सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक केंद्र बनाते हैं। जगन्नाथ पुरी की वार्षिक रथ यात्रा, जिसमें पूरे विश्व से लाखों लोग उपस्थित होते हैं, इसे विश्व प्रसिद्ध बनाती है। इस रथ यात्रा की गाथा इसके प्रति भक्ति का और गहरा भाव उत्पन्न कर देती है।
आस्था के साथ मनोरंजन का जो समागम पुरी में होता है वह संभवतः दुनिया के किसी और नगर में देखने को नहीं मिलता होगा। यहाँ एक ओर भक्ति में डूबने के लिए आस्था का अनंत सागर आपको आकर्षित करता है, वहीं दूसरी ओर विशाल एवं स्वच्छ समुद्र मनोरंजन में डूब जाने के लिए आपको सम्मोहित कर लेता है। पुरी के विशेष व्यंजन आपको प्रभावित करने से नहीं चूकते और मंदिर में भात का प्रसाद अपनी एक अलग पहचान रखता है।
दर्शन के उपरांत जब हम समुद्र के निकट पहुँचे तो पाया कि समुद्र के लंबे किनारों पर दूर दूर तक सुंदर नीला-हरा सा पानी दिखाई दे रहा है। समुद्र-तट सुंदर होने के साथ साफ़-सुथरा भी था। समुद्र और धरती के बीच असंख्य लोगों का जमावड़ा था। हर कोई समुद्र की लहरों के आनंद में डूबा हुआ था। वह दृश्य आपको पूरी तरह से तनाव मुक्त कर देता है। वहाँ इतनी भीड़ में भी डर का कोई भाव नहीं था।
लोग उन्मुक्त से समुद्र का आनंद ले रहे थे और कोई रोक-टोक नहीं थी। अन्यथा समुद्र-तट पर सुरक्षा के प्रहरी लोगों को घुटने भर पानी के आगे जाने ही नहीं देते हैं। यहाँ भी सुरक्षा का ध्यान दिया जा रहा था लेकिन आम-जान की प्रसन्नता में कोई कठिनाई नहीं थी। जिससे मुझे आभास हुआ कि समुद्र-तटों पर सहज रोमांच की इतनी अनुभूति कम ही होती है। आगे बढ़ने पर समुद्र की ऊँची-ऊँची लहरें हमारे तन को पूरे मन से भिगा देती हैं और हमारे अहं को जैसे समुद्र की गहराइयों में डुबा देती हैं। समुद्र से नहा कर जो निकलता है वो प्रसन्नता से सराबोर एक हल्के मन का व्यक्तित्व होता है।
पुरी की यात्रा ने जहां हमें एक धार्मिक रंग में रंग दिया वहीं मंदिर की भव्यता ने हमें हमारी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व से भाव विभोर कर दिया। भारत को जितना देखो और जानों उतना ही यह बोध होता जाता है कि इसे और जानने की आवश्यकता है।


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