Tuesday, January 2, 2024

बांघवगढ़ का चिल्ला और पिल्ला




नाम में क्या रखा है। बात बांधवगढ़ में कुछ दिन पहले की है। 

गांव का नाम है चिल्लारी जहां एक मित्र ने बहुत सुंदर घोंसला बनाया है। गांव जैसा ही गांव का घर, चूल्हा-चौका, कुछ काम करने वाले स्थानीय लोग और ढेरों साग-सब्ज़ियों के बगीचों के बीच चहचहाती चिड़ियाएँ। उन्होंने मधुमक्खियों के पानी पीने के लिए विशेष ध्यान रखते हुए पत्थर पर पत्थर रखे हैं। वहाँ उनके मित्रों के रुकने के लिए एक अलग झोंपड़ी है जो कीट-पतंगों एवं छिपकलियों से बचाव के लिए ज़मीन से एक फिट की ऊंचाई पर बनाई गई है। 

उस झोपड़ी के नीचे स्वान का एक परिवार भी रह रहा था। दो छोटे पिल्ले जिनकी अभी आंख भी नहीं खुली थी। चलना तो दूर उनकी मां उन्हें सँभालकर अपने आस पास ही रख रही थी और यदा-कदा दूर रहते हुए भी समय-समय पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थी। 

कुछ देर में वहाँ भोपाल से दो बच्चियों का आगमन हुआ। एक चुस्त दुरुस्त, तेज़ दौड़ भाग करने वाली, अति उत्साही जिसकी आयु लगभग आठ वर्ष थी और दूसरी थोड़ी मनमौजी और शांत जिसकी आयु लगभग बारह वर्ष थी।दोनों कदमताल करती आगे-पीछे बढ़ती जा रही थीं मानो एक दूसरे की पूरक हों। एक स्थिर, दूजी चंचल। 

जैसे ही उनकी नज़र उन नन्हें शावकों पर पड़ी, वे दौड़ीं लेकिन थोड़े भय के साथ दोनों की ओर बढ़ीं। उन्होंने इनका नाम चिल्ला और पिल्ला रख दिया। उनकी माँ आस-पास नहीं थी और चिल्ला धीरे-धीरे बाहर की ओर सरक रहा था एवं पिल्ला घबराए उल्टी दिशा में दुबक रहा था। चिल्ला तेज़ और मिलनसार था और पिल्ला थोड़ा आरामपसंद। चिल्ला बिना डरे उन बच्चियों के पास पहुँचा और उनकी गोद में बैठ गया। 

बच्चियों ने चिल्ला के साथ काफी समय बिताया लेकिन चिल्ला बार-बार पिल्ला के पास जाता और उसके हाल-चाल देख कर लौट आता। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वह माँ की अनुपस्थिति में भाई की देखभाल कर रहा हो। 

उसकी सक्रियता देख दोनों लड़कियों ने चिल्ला को अपने साथ भोपाल ले जाने का मन बना लिया। यात्रा कैसे करनी होगी, चिल्ला कहां बैठेगा, कौन उसे सफर के दौरान संभालेगा सब कुछ फिक्स हो चुका था। और फिर आगे जो हुआ उसे आप जानकर खुश होंगे और निःशब्द भी ….

चिल्ला और पिल्ला लगभग एक माह के हो चुके हैं मां ने बाहर आना-जाना प्रारंभ कर दिया है। 

आग क्या हुआ होगा? आपको क्या लगता है



No comments: