Friday, April 12, 2024

वे मकान नहीं घर थे






 

परसों रात मैं रीवा जाने के लिये ट्रेन में बैठा और अगली सुबह सतना पहुँच गया।

 

ट्रेन में कभी अच्छी नींद आती है कभी नहीं। वह रात कुछ अलग थी क्योंकि ट्रेन में एक कोने की सीट मिली थी और इसलिए अंदर आती हुई पहियों की आवाज़ नज़दीक से सुनाई दे रही थी। प्रयास करने पर नींद तो आ गई लेकिन ट्रेन के बार-बार रुकने और झटके लगने से नींद फिर खुल गई। लेकिन फिर भी किसी तरह करवटें बदलकर 4-5 घंटे सो लिया। ट्रेन के सफ़र में इतनी नींद पर्याप्त कही जाती है। 

 

सुबह 6:40 बजे ट्रेन से उतर कर सीधे सतना मेडिकल कॉलेज पहुँच निरीक्षण किया। कॉलेज की अन्य आवश्यकताओं एवं चुनौतियों के संबंध में चर्चा कर मैं आगामी मीटिंग के लिए रीवा निकल गया।

 

रीवा में कॉलेज का निरीक्षण कर, पुराने निर्देशों के कार्यान्वयन की स्थिति और नवीन कार्यों की समीक्षा कर मैं सिंगरौली के लिये रवाना हो गया। सिंगरौली में नवीन मेडिकल कॉलेज का कार्य तेज़ी से चल रहा है। सिंगरौली में मेडिकल कॉलेज की स्थापना से ज़िले एवं आस-पास के इलाक़ों के स्वास्थ्य सूचकांक में तेज़ी से सुधार होना अपेक्षित है। 

 

एक अच्छा शिक्षण संस्थान ना केवल पढ़ने वालों का जीवन बदलता है बल्कि आस-पास के इलाक़ों की अर्थव्यवस्था को भी बदल देता है। मेडिकल कॉलेज स्वास्थ्य सेवाओं में भी इज़ाफ़ा कर देता है। शाम होने से पहले मैं अगले पढ़ाव शहडोल के लिये निकल पड़ा। 

 

सिंगरौली से मझौली का रास्ता एक अलग तरो-ताजगी से भरा हुआ था। ना जाने कब नींद लगी और कब खुली। ऐसा लगा जैसे मैं किसी अलग दुनिया में पहुँच गया हूँ। छोटे-छोटे गाँव, जिनमें बहुत सुंदर मकान बने हुए थे। 

 

घने जंगल से होकर जाते हुए मैंने कुछ मकान देखे जो पर्यावरण के साथ एकरूपता के जीवित प्रमाण हैं। ऐसे घर जो स्थानीय पर्यावरण अनुकूल संसाधनों से बने हैं और उनमें कंक्रीट का कहीं नामो-निशान नहीं मिलता। वे एक ऐसे जीवन की मिशाल देते हैं जिसे जीने की हम केवल कल्पना कर सकते हैं और जिसे बनाने के लिए हमें अत्यधिक संसाधनों का उपयोग करना पड़ता है। उन घरों को देख कर नाना जी का गाँव और घर याद आ गया। मेरा दिल किया कि बस किसी घर में एक दिन के लिए रुक जाया जाए।

 

मिट्टी की दीवारें, दीवारों पर हल्का मिट्टी का रंग जो उन मकानों को प्रकृति से मेल खिला रहा था, घुमावदार कवेलू की छत,, छत की मन-मोहक ढलान, कच्ची बाउंड्री, लकड़ी का सुंदर दरवाज़ा, हर दिशा से समरूप होते हुए वे मकान नहीं थे बल्कि घर थे। 

 

घरों में रहने वाले वे लोग सहायता को आतुर थे और उनके पास अजनबियों के लिए भी पर्याप्त समय और स्नेह था। उनके इस बड़प्पन को देख कर मुझे शहर का जीवन याद कर कुछ लज्जा भी हुई। छोटे लेकिन पर्याप्त, साधारण लेकिन कला के अनूठे प्रयोग, जीवन से ओत-प्रोत वे घर बड़े दिल वालों के थे जो मध्य प्रदेश की कला एवं संस्कृति का प्रतिबिंब हैं।

 

वहीं दूसरी ओर इन कला के केंद्रों के बीच बहुत से पॉवर प्लांट आधुनिकता की एक अलग छाप छोड़ते हैं। परंपरा और आधुनिकता के इस चट-पटे मिश्रण के साथ अपनी विस्मयकारी यात्रा में बस यही सोचता हुआ, दिल में ख़ुशी संजोय मैं आगे बढ़ता गया और जब तेज बारिश के बाद घना अंधेरा छा गया तब रात मैं मझौली में रुक गया।


Sunday, April 7, 2024

प्रत्यक्ष लक्षद्वीप

 





दुनिया में कुछ स्थान ऐसे होते हैं जो दुनिया के एक छोर पर होते हैं लेकिन असल में एक नये जीवन की शुरुआत का केंद्र होते हैं। भारत के एक छोर पर ऐसी ही एक जगह है लक्षद्वीप। हाल ही में मेरा लक्षद्वीप जाना हुआ। जब मैं वहाँ पहुँचा तो मन में सिर्फ़ एक ख़याल था कि यह दुनिया का कोई विस्मयकारी स्थान है। नीला आसमान, हरा, सफ़ेद, नीला, काला एवं ना जाने कौन-कौन से रंग का पानी। इतना साफ़ पानी कि आप गहराई पर समुद्र तल को देख लें। अलौकिक आकर्षण का केंद्र - लक्षद्वीप।

लक्षद्वीप जाना बहुत दुर्गम माना जाता है। यहाँ पहुँचने के लिये कोच्चि सबसे निकटतम स्थान है। कोच्चि के लिए देश के सभी राज्यों से हवाई एवं रेलसेवा उपलब्ध है। कोच्चि से जहाज़ के द्वारा वहाँ पहुँचने में लगभग 16 घंटे लगते हैं। वैसे लक्षद्वीप पहुँचने के लिये अब कोच्चि के अलावा बेंगलुरु से भी फ्लाइट प्रारंभ हो गई है जिससे लक्षद्वीप पहुँचना आसान हो गया है। अगत्ती द्वीप पर हवाई अड्डा है और बड़े जहाज़ के लिये एक छोटा हार्बर भी है। कोच्चि के अलावा मुंबई एवं गोवा से भी लोग यहाँ क्रूज़ में आते हैं।

लक्षद्वीप में बहुत से द्वीप हैं जिनमे बंगाराम सबसे अलौकिक है। वहाँ पहुँचते ही टूरिज्म विभाग के होटल मैनेजर तंसीर ने हमें द्वीप के बारे में बताया और हमारी जिज्ञासा और रोमांच को सातवें असमान पर पहुँचा दिया। यह एक छोटा सा द्वीप है जिसपर कोई स्थानीय आबादी नहीं है। बंगाराम में समुद्री एडवेंचर की सभी गतिविधियों का केंद्र है। जैसे स्नॉर्कलिंग, कयाकिंग, स्कूबा डाइविंग, स्विमिंग, स्पीड बोटिंग इत्यादि। साथ ही द्वीप पर घूमने, साइकिलिंग करने और फोटोग्राफी के लिये पर्याप्त ठिकाने हैं। पहुँचते ही आप समुद्र में छलांग लगाने से स्वयं को नहीं रोक पाते।

इस प्रकार एक टूरिस्ट के नज़ीरिये से समय बिताने के लिए बंगाराम में पर्याप्त व्यवस्था है। हम दरवेश्वरूद्दीन की नाव से अगत्ती से बंगाराम पहुँचे। रास्ते में दरवेश्वरूद्दीन ने हमें कोरल के बारे बताया और मछुआरों की कुछ कहानियाँ सुनाई और ना जाने 1 घंटे का सफ़र कैसे पूरा हो गया।

समुद्री जीवन आपको रोमांचित कर देता है ख़ास तौर से कोरल रीफ एवं विभिन्न प्रकार की मछलियाँ। समुद्र के अंदर की गतिविधियों को भाँपने के लिए स्नॉर्कलिंग एवं स्कूबा डाइविंग सबसे उपयुक्त गतिविधियाँ हैं। अमान ने हमें स्कूबा डाइविंग के हुनर सिखाये और मैं दंग रेह गया जब उन्होंने गहरे समुद्र में मुझे रंग बिरंगी मछलियों के अलावा शार्क, टर्टल और मंटा रे जैसे विशेष जीवों को दिखाया। शार्क देख कर तो मेरी रूह काँप गई लेकिन मन प्रसन्न हो गया। मैंने इसकी कभी कल्पना ही नहीं की थी। 

इन गतिविधियों से मैंने समुद्र और समुद्री जीवन के महत्व को बहुत बारीकी से समझा। लगा कि धरती पर जितनी विविधता है शायद उससे भी अधिक समुद्र के भीतर है। मन में बस यह भाव थे कि पर्यावरण को सुरक्षित रखना कितना आवश्यक है अन्यथा ग्लोबल वार्मिंग से सारे कोरल नष्ट हो जाएँगे और इतने सारे समुद्री जीव भी। जो समुद्र के रहस्यों में दिलचस्वी रखता है ऐसे पर्यावरणविद के लिये भी यह एक आदर्श स्थान है। स्थानीय लोगों का समर्पण और सेवा भाव आपका दिल जीत लेता है।

जितना सुंदर बंगाराम है उतना ही सुंदर अगत्ती भी है और ऐसे ना जाने लक्षद्वीप के कितने अन्य द्वीप। सब पर एक साथ जाना मेरे लिए संभव नहीं था लेकिन आप ज़रूर एक्स्प्लोर कर सकते हैं। अगत्ती एवं कवरत्ती पर रुकने के लिए होमस्टे एवं छोटे कॉटेज़ भी अच्छे विकल्प हैं। यह एक अलग दुनिया महसूस करने के लिए एक आदर्श झरोखा है।

जब पूर्णिमा की रात समुद्र के सामने बैठ मैं चिंतन कर रहा था तब लगा कि समुद्र में हलचल नहीं होती, ज्वार-भाटा नहीं आता तो समुद्र कितना नीरस लगता। बिना लहरों का समुद्र! क्या आप कल्पना कर सकते हैं? शायद नहीं। पानी का निकट आना फिर दूर जाना, पानी का तीव्र होना फिर शांत हो जाना, लहरों का आना और लौटना यह सब चंद्रमा के प्रभाव से होता है। चंद्रमा नहीं होता तो कितना कुछ नहीं होता। 

मुझे लगा कि हम जीवन के उतार-चढ़ाव से कितने प्रभावित होते हैं। परंतु समुद्र की तरह हमारे जीवन में भी उतार-चढ़ाव आवश्यक हैं अन्यथा हमारा जीवन भी ठहरे हुए पानी की तरह बहुत रसहीन हो जाएगा। लक्षद्वीप पर बिताये चंद दिनों का रोमांच तो थम गया था लेकिन कुछ मीठी सी यादों के साथ इस निष्कर्ष को लिए मैं अपने घर लौट रहा था।

Friday, March 8, 2024

हर हर महादेव

 





चौरागड़ पचमड़ी में स्थित सतपुड़ा की दूसरी सबसे ऊँची चोटी है जहां देवों के देव महादेव का निवास है। हिंदू कैलेंडर के इस महत्त्वपूर्ण महाशिवरात्रि के दिन चौरागड़ की तलहटी में एक विशाल मेला आयोजित होता है जहां एक ही दिन में आस-पास के लाखों श्रद्धालु पहुँचते हैं। श्रद्धालु विशाल त्रिशूलों को लेकर चौरागड़ तक का सफ़र करते हैं और महादेव को प्रशन्न करने के लिए उसे मंदिर के पास स्थापित करते हैं। यह क्रम कई वर्षों से चला आ रहा है।

कालांतर में इन त्रिशूलों की संख्या इतनी अधिक होती गई कि बहुत से त्रिशूलों का उपयोग सीढ़ियों पर डिवाइडर के रूप में किया गया और कुछ का बाउंड्री बनाने में। लोगों की आस्था ने वहाँ इतना लोहा इकट्ठा कर दिया कि मंदिर के आस-पास के निर्माण के लिए शायद अब लोहा ले जाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती है। 

प्राकृतिक दृश्यों से परिपूर्ण चौरागड़ महादेव का यह सफ़र अद्भुत है। कभी बंदरों का समूह हमें सतर्क करता है तो कभी दोनों और गहरी खाई के बीच से होता हुआ ऊपर की और बढ़ता रास्ता। दूर-दूर तक पसरी शांति के मध्य “हर हर महादेव” के जयकारों के साथ जब हम मंदिर की ओर बढ़ते हैं और ईश्वर की प्रतिमा के दर्शन के लिए व्याकुल होते हैं तब चारों ओर पहाड़ों पर बिखरी हुई हरी चादर मन को सुकून प्रदान करती चली जाती है और हम मंत्र-मुग्ध से बिना थके बिना रुके बस आगे बढ़ते चले ज़ाते हैं।

मेले के समय पूरे रास्ते में दोनों ओर खाने-पीने, खिलौने, प्रसाद एवं अन्य उपयोगी वस्तुओं की दुकानें लगी रहती हैं। यह मेला स्थानीय लोगों के लिए एक अवसर होता है जब वे साल भर के लिए कुछ आमदनी इकट्ठी कर लेते हैं। बाक़ी पूरे वर्ष भी नींबू-पानी, बेर, ककड़ी, अमरूद या सीता-फल की दुकानें रास्तों को सुसज्जित करती हैं और राहगीरों का मनोरंजन करती हैं।

चूँकि यह स्थान सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व का हिस्सा है इसलिए फारेस्ट विभाग का अमला मेले के समय विशेषतौर पर यहाँ उपस्थित रहता है। मेला प्राधिकरण और प्रशासन मेले की संपूर्ण व्यवस्था करते हैं और पूरे समय एलर्ट रहते हैं। मैंने आभास किया है कि प्रशासन के लगातार प्रयासों से दिन-प्रतिदिन व्यवस्थाओं में सुधार होता गया है और आज हम यह कह सकते हैं कि इस स्थान के दर्शन के लिए एक स्थाई व्यवस्था स्थापित हो गई है।

मैं इस मंदिर में इतनी बार आ चुका हूँ कि अब गिनती याद नहीं लेकिन फिर भी मुझे यहाँ बार-बार आने की इच्छा होती है और हर बार लगता है जैसे कि मैं पहली बार आया हूँ। यह ऊँचाई पर स्थित मात्र एक मंदिर नहीं बल्कि आस्था का एक ऐसा केंद्र है जो प्रत्येक सीढ़ी चढ़ने पर आपको आध्यात्म की गहराई में ले जाता है और भावनाओं से सराबोर कर देता है। 

जब मंदिर में पहुँचकर हम अपनी आँखें बंद करते हैं और ईश्वर के ध्यान में लीन हो जाते हैं तब हम बार-बार अनुभव करते हैं कि जैसे हम किसी अनंत सागर की गहराई में चले जा रहे हों और फिर अंत में हमारे दिल के द्वार पर पहुँच गये हों। इसी प्रकार जब हम अपने दिल में झांकते हैं तब भी हम भावनाओं के महासागर से होते हुए फिर मंदिर में प्रकट होते हैं। इस भावना को व्यक्त करना इतना कठिन है कि बस मैं इतना कह सकता हूँ कि आप एक बार चौरागड़ महादेव जाइये और भावना के इस स्पंदन को स्वयं समझिए।

शिव आदि हैं, शिव अनंत हैं एवं शिव ही सत्य हैं।

Saturday, February 24, 2024

लाइफ एट ईशा …

 





5 दिवसीय ट्रेनिंग में मेरा ईशा योग केंद्र पहुँचने का संजोग बना। मैं कोयंबटूर पहुँचा, जहां से ईशा योग केंद्र 30 किमी दूर वेलियंग्री की तलहटी पर सदगुरू द्वारा स्थापित किया गया एक नया जीवन है। शहर को चीरता हुआ रास्ता, पहाड़ों की गोद में ऐसे रमणीय स्थान पर ले जाता है जिसकी मैंने कल्पना ही नहीं की थी। 


शाम के अंधेरे में योग केंद्र पर पहुँचकर पता चला कि सुबह ४ बजे सुबह उठना पड़ेगा। थोड़ा घबराते हुए मैंने रात्रि विश्राम किया। मैं अचंभित था जब पूरी अक्षीणता के साथ मेरी नींद खुली और मैंने देखा कि घड़ी में सुबह के 3:58 बज रहे थे। दो मिनट बाद ढोल नगाड़ों ने सुबह के माहौल में और अधिक ऊर्जा का संचार कर दिया। 5 बजे लोग तैयार होकर योगाभ्यास के लिए तैयार थे। कुछ साथियों से भेंट हुई जो बहुत दिनों बाद मिले थे। 

जब समय मिलने पर मैं भ्रमण के लिए निकला तब मैंने देखा कि कोई मंदिर के सामने योगाभ्यास कर रहा है, कोई सुंदर मंडप में वैदिक क्रिया कर रहा है, कोई हवन कर रहा है और कोई तालाब के किनारे ध्यान कर रहा है। आगे मैंने स्कूल, लाइब्रेरी एवं एक बड़ा भोजन कक्ष देखा जहां लोग आते, भोजन करते और चले जाते लेकिन कहीं भी गंदगी देखने नहीं मिली। 

आवश्यकताओं के लिए सुंदर दुकानें और वह सभी कुछ था वहाँ जो उस आश्रम को पूर्णता प्रदान करता है जैसे कोई छोटा सा स्वावलंबी देश हो। वहाँ मैं 2003 बैच के एक सीनियर आईएएस, अम्बरीश कुमार से मिला जिन्होंने तीन वर्ष के लिए अपनी सेवाएँ ईशा फाउंडेशन को दे दी है। मैं आश्चर्यचकित था। वे ईशा आउटरीच के प्रोजेक्ट डायरेक्टर हैं। देखने में एक साधारण संन्यासी लेकिन उनके विचार आकाश की ऊँचाइयों वाली प्रेरणा देने वाले थे।

ट्रेनिंग में आये प्रतिभागियों के लिए रुकने और भोजन के लिए अलग स्थान था। भोजन ऐसा था जिसमें सभी आवश्यक पोषक तत्वों का समावेश था। भोजन साधारण होते हुए भी ऐसा था कि स्वाद आपको आनंदित कर दे एवं जिसे ग्रहण कर कभी कोई भारीपन ना लगे। चुकंदर, गाजर, ककड़ी, सर्पगंधा इत्यादि की सलाद, नारियल चावल, दही लौकी, सब्ज़ियों का जूस, मूँगफली की खिचड़ी, धनिया की कॉफ़ी इत्यादि भोजन के कुछ विशेष व्यंजन थे।

इनर इंजीनियरिंग के योग कार्यक्रम में हम प्रतिदिन कुछ सीख रहे थे। सुबह दोपहर और शाम योग ध्यान में बीत रहा था एवं प्रतिदिन कुछ नया करने के लिए एक नई गतिविधि रहती थी जो आनंद की असीम व्यक्तिगत अनुभूति करा रही थी एवं जिज्ञासा को लगातार बांधे हुए थी। पहले दिन योग क्लास के बाद शाम को तीर्थकुण्ड में डुबकी लगाकर मन तरबतर हो गया। कुंड के ठंडे पानी ने शरीर को पूरी तरह हल्का कर दिया।

अगले दिन शाम को ध्यानलिंग पहुँच कर अनंत के स्पंदन ने मन को समस्त विकारों से दूर शून्य की ओर धकेल दिया। फिर शाम को लिंग भैरवी में आरती और दीपों के प्रकाश ने मन के प्रत्येक कोने को प्रज्वलित कर दिया। जब चाँदनी रात में हम लोग 112 फीट ऊँची अदियोगी की प्रतिमा के पास पहुँचे तो ऐसा लगा जैसे वह प्रतिमा जीवंत हो उठी हो। 

कभी हम सदगुरु से मिले तो कभी उनका सत्संग सुना। कभी हमने पूरे आश्रम को घूम कर देखा तो कभी योग सिखाने वाले स्वयंसेवियों ने मैदान में भरपूर खेल खिलाए। दौड़, फुटबॉल, बास्केट बॉल, टिप्पू इत्यादि खेल कर लगा जैसे हम बचपन में लौट गये हों। प्रतिदिन नित नए दर्शन होते चले गये और पता नहीं कैसे स्पंद हॉल में लगातार चली योग क्लास में हमने शांभवी महामुद्रा ध्यान पद्यति सीख ली। 

जब मैंने वापसी की यात्रा प्रारंभ की तो देखा कि ख़ाली हाथ योग केंद्र पहुँचे लोग, तन-मन की शुद्धि कर एक बहुमूल्य उपहार लेकर लौट रहे थे। ईशा फाउंडेशन कोयंबटूर कोई साधारण स्थान नहीं बल्कि जीवन के आनंद की खोज का एक विशेष पड़ाव है। 

Saturday, February 17, 2024

सूर्य की पहली किरण का मंदिर - कोणार्क





 सूर्य मंदिर ओड़िशा के समुद्र तट पर पुरी शहर से लगभग 35 किलोमीटर उत्तर पूर्व में 13वीं शताब्दी का मंदिर है। इसके निर्माण का श्रेय पूर्वी गंगावंश के राजा नरसिंह देव प्रथम को दिया जाता है। आप तेरहंवी सदी के राजा की दूरगामी सोच को महसूस करें। सृष्टि की ऊर्जा का केन्द्र सूर्य का मंदिर। इसे देखने की उत्सुकता हमें मंदिर तक ले आई। 

सूर्य मंदिर दक्षिण अमेरिका से लेकर अफ़्रीका और चीन तक बनाये गये। भारत में भी कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सूर्य मंदिरों का निर्माण हुआ। 

पत्थरों को तराश कर बनाया गया यह एक विशाल मंदिर है जिसमें बहुत से भव्य द्वार और विशाल मूर्तियाँ हैं। मूर्तिकला के माध्यम से यह जीवन के सार को प्रदर्शित करता है। रचनात्मकता एवं कलाकृति की दृष्टि से यह अद्भुत है।  


कोणार्क सूर्य मंदिर के निर्माण में दिशाओं का इस प्रकार से विशेष ध्यान रखा गया है कि किसी भी ऋतु में केवल सूर्य की किरणों से समय का अनुमान लगाया जा सके। इसके अलावा मंदिर में रथ के जो पहिये बने हैं वे जीवन के विभिन्न चरणों को दर्शाते हैं। 


कोणार्क पहुँचने पर मन में एक सवाल आया - भारत के इतने महत्वपूर्ण कला और विज्ञान के प्रतीक के बारे में स्कूल में हमें विस्तार से क्यों नहीं पढ़ाया गया जबकि कई और निरर्थक स्मारकों को पाठ्यक्रम में ज़्यादा महत्व दिया गया। कई ऐसे जो इतनी योग्यता भी नहीं रखते और जो केवल लोगों के दुखों की कहानियाँ सुनाते हैं। यह मंदिर सकारात्मक ऊर्जा का भंडार है। इस सूर्य मंदिर पर तो पीएचडी की पूरी थीसिस लिखी जा सकती है। 


मेरे बच्चों ने जब इसे देखा तब वे अत्यधिक प्रसन्न हुए और उत्साह से सराबोर होकर उन्होंने मुझसे ढेरों सवाल किए। प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर पाकर वे फोटोग्राफी में व्यस्त हो गये और मैं कला के विशाल समुद्र में गोते लगाने लगा। उनके सवालों से मुझे आभास हुआ कि प्रत्येक बच्चे को इसके बारे में जानना कितना आवश्यक है। स्कूल के पाठ्यक्रम में इसके बारे में और अधिक विस्तार से पढ़ाने की आवश्यकता है क्योंकि यह जिज्ञासा पैदा करता है और बच्चों में वैज्ञानिक सोच विकसित करने में बहुत सहायक है।


सूर्य मंदिर वो अनूठा स्थान है जहां आस्था और विज्ञान का समागम होता है। यह हमारी संस्कृति की वास्तविक सोच और कला का एक और उत्कृष्ठ उदाहरण है।

Wednesday, February 14, 2024

अब भव्य हिंदू मंदिर यूनाइटेड अरब एमिरात में

 




photo courtesy - x @AbuDhabiMandir

अब हम अचंभित करने वाली भविष्य में ऐसी और कल्पनाओं को साकार होते भी देख सकते हैं जैसे कि इस्लामिक गणराज्य में हिंदू मंदिर स्थापित होना जो मूर्तिकला का एक अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत करता है। अब यह एक चमत्कार ही कहा जा सकता है कि एक मुस्लिम देश में यह विशाल हिंदू मंदिर धर्म, आस्था, कला और अद्यात्म का एक नया केंद्र बनने जा रहा है। 

अबू धाबी के निकट स्वामी नारायण संस्था द्वारा बनाए जा रहे हिंदू मंदिर का भूमिपूजन प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सन् 2018 में किया था। अब यह मंदिर बनकर तैयार है एवं इसका लोकार्पण आज प्रधानमंत्री मोदी जी के द्वारा किया जाना है। 

कैसे नरेंद्र मोदी जी ने मुस्लिम शासकों को अबू धाबी में हिंदू मंदिर बनवाये जाने के लिये प्रेरित किया होगा? विचार करें। और कैसे स्वामी जी ने भारत के स्वाभिमान को वहाँ स्थापित करने के लिए जतन किए होंगे। यह मरुस्थल में एक मरीचिका की तरह लगता है।

मैं अपनी किताब के लिए स्वामी ब्रह्मविहारी जी से मिला था। मैंने साक्षात्कार के समय उनके व्यक्तित्व की गहराई को जाना था और इसीलिए यह भी कहना ग़लत नहीं होगा कि इस ऐतिहासिक कार्य के पीछे स्वामी नारायण संस्था के स्वामियों एवं उनके अध्यात्म की शक्ति का विशेष योगदान है, अन्यथा किसी का विश्वास जीतना आसान नहीं होता और धर्म के विषय में तो बिलकुल भी नहीं। 

यह मंदिर जहां एक ओर इस्लाम की उदारता को उजागर करता है वहीं दूसरी ओर संस्था के कौशल एवं सामर्थ को दर्शाता है। मंदिर की भव्यता संस्था की रचनात्मकता, अखंडता, गंभीरता, संवेदनशीलता एवं चरित्र की विशालता को दर्शाती है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं की शीघ्र ही इस मंदिर को देखने लाखों लोग वहाँ पहुँचने लगें।

तो क्या यूं कहें की रेत में भी कमल खिलाए जा सकते हैं।

Wednesday, January 17, 2024

राजधानी अयोध्या



भारत की असीम संपदा एवं वैभव ने दूसरे देशों से लोगों को सदियों से अपनी ओर आकर्षित किया है। वर्षों पूर्व भारत एक एकीकृत सांस्कृतिक क्षेत्र तो था लेकिन वह एक राष्ट्र नहीं था बल्कि कई छोटे-छोटे राज्यों के रूप में एक अघोषित गणराज्य जैसा था जिसपर किसी एक शक्तिशाली शासक का प्रभाव तो रहता था लेकिन सभी राज्यों को स्वतंत्रता भी काफ़ी थी। राष्ट्रीय स्तर का शासन अभाव होने से आक्रांता भी भारत की ओर आकर्षित हुए और एक शक्तिशाली केंद्र के आभाव में भारत पर हावी होने लगे और उन्होंने अंततः भारत पर क़ब्ज़ा स्थापित कर लिया और शासक बन गए। 


आक्रांताओं ने भारत की आत्मा को कुचलने के लिए उसके पूजा के स्थानों को बर्बाद करना प्रारंभ किया जिससे लोग भयभीत हो जाएँ और उनका धर्म बदल जाए। बदले हुए धर्म से आक्रांता अधिक निष्ठा की अपेक्षा कर रहे थे। इस प्रकार से यह उनकी दोहरी जीत होती। इसी क्रम में एक आक्रांता, बाबर ने भारत पर गहरा प्रहार करते हुए भारत के एक सबसे प्रिय नायक भगवान राम की जन्मभूमि पर अपने धार्मिक स्थल का निर्माण कर दिया। कई वर्षों तक राम का वह मंदिर वीरान हो गया।


राम को हिंदू विष्णु का अवतार मानते हैं और उनकी पूजा भी करते हैं। राम हिंदुओं के आदर्श हैं। वे अपने जीवन की प्रत्येक भूमिका में आदर्श रहे और इसीलिए वे हर भारतीय के लिए प्रेरणास्रोत हैं। कुछ लोगों को राम से कुछ शिकायत भी होती है फिर भी वे सभी के दिल में बसते हैं। ऐसा इसीलिए क्योंकि राम ने अनेकों समस्याओं से ग्रसित होने पर भी एक आदर्श आचरण कभी नहीं छोड़ा। राम की सम्पूर्ण भारत की यात्रा ने पूरे उपमहाद्वीप को एक धागे से पिरोने का कार्य किया। उन्होंने बुराई पर अच्छाई की जीत के लिए अपना सर्वस्व लगाया। 


रामलला का अयोध्या में पुनः विराजमान होना पूजा से बढ़कर हिंदू जाग्रति का प्रतीक है। ऐसा इसलिए क्योंकि वर्षों तक बिना किसी कारण के हिन्दू अपने इस आदर्श की ना केवल पूजा से वंचित रहे बल्कि आक्रांता के प्रहार, अंग्रेजों की विभाजनकारी नीतियों और आज़ादी के बाद की समस्याओं से अपने ही धर्म और धार्मिक अधिकारों से दूर हो गए। ऐसे में अयोध्या का पुनरुत्थान एक नए उदय का संकेत है। 


यह उदय पूर्व की भाँति किसी के विरुद्ध नहीं है। इसीलिए प्रत्येक भारतीय को इसका समर्थन करना चाहिए क्योंकि सभी भारतीय हिंदू ही तो हैं। जो स्वयं को कुछ और समझें वे केवल कट्टरवादी कहे जा सकते हैं। भारत में कट्टरता के लिए कभी जगह नहीं रही और ना रहेगी। 


सभी धर्मों को इसका दिल खोलकर इसलिए समर्थन करना चाहिए क्योंकि विरोध या समर्थन केवल यह दर्शाएगा कि वे आक्रांताओं को अपना मानते हैं या समान रक्त वाले अपने जैसे दिखने वाले लोगों को। उन्हें भूलना नहीं चाहिए कि उन्होंने धर्म बदला है रक्त नहीं। और कोई अन्य देश उन्हें धर्म के आधार पर ना तो अपने घर पर बैठाएगा, ना खिलाएगा और ना ही अपने देश में बसने के लिए जगह देगा। वो देश को उग्रवाद की आग में ढकेलने के लिए चंदा अवश्य दे देगा। लेकिन अब वो समय चला गया जब कोई ऐसा कर सके।


आइए हम सब मिलकर रामलला के विराजमान होने के इस अलौकिक क्षण में उत्सव मनाएँ। वे लोग भी इस समारोह का आनंद लें जो धार्मिक नहीं हैं क्योंकि यह केवल धर्म के लिए नहीं बल्कि इसका संबंध हमारे अस्तित्व और सम्मान से है। ये पल उस संस्कृति का प्रतीक भी है जिस संस्कृति ने हमें अपने-अपने विचार रखने और अपने अनुसार जीने की स्वतंत्रता दी है क्योंकि कोई और संस्कृति इतनी स्वतंत्रता देती ही नहीं है जितनी भारत की इस धरा से उपजने वाली। अन्यथा आज दूसरे कई देशों से अन्य धर्म ग़ायब नहीं हो जाते। हिंदू भारत कभी किसी और धर्म के इतने विरुद्ध नहीं हो सकता कि उसे जीने ही ना दे। यह भारत और भारतीय की संस्कृति नहीं है।


भारत में राम मंदिर का निर्माण हिंदुओं के उस सम्मान और गौरव का प्रतीक है जो समय के साथ बदलने की हिम्मत कर आगे की ओर देखता है। इस गौरव और सम्मान से दूसरे धर्मों का गौरव और सम्मान कम नहीं होता है।