Thursday, January 10, 2013

बदलती पहचान

डर  था इस बात का गुम  न हो जाएँ हम कहीं
कहीं नए युग के अंधियारों में
उजाले ऐसे की प्रकाश ही हर तरफ
फिर भी मिलता कोई नहीं मक़ाम .
डर था कंप्यूटर के इस युग में खो जाऊं न कहीं
0-1 के खेल में, कहीं खो न जाये मेरी पहचान,
 सताता था मुझे कंप्यूटर का ज्ञान।
डर था की जिस तरह कंप्यूटर में हर बात
0 या 1 होती है उसी तरह मेरी जिंदगी भी
बक्से में बंद 0 या 1 न हो जाये।
आईडिया का विज्ञापन देख में कुछ और घबराया था।
आज नंदन ने यह सच कर दिया जब डाकिये ने
मुझे मेरा नंबर दिया जिसे दुनिया बड़े प्यार से कहती है
यूनिक आइ डी .
यह भले ही यूनिक हो लेकिन अब मै भी एक नंबर बन गया हूँ
मेरा वजूद भी कंप्यूटर रुपी इस दुनिया में एक नंबर हो गया है
मै 0-9 के बीच घूमता हूँ लेकिन दुनिया रुपी इस डब्बे में
खुद को ढूँढता हूँ। नहीं पता किसी को आज कौन है
पडोसी, कौन है रिश्तेदार, बस सबको पता है अपना आधार अपना आधार।
जिसने बना दिया मेरा संसार निराधार कैद कर मुझे एक नंबर में।
अब मै केवल एक नंबर हूँ हाँ अब मै केवल एक नंबर हूँ।



Tuesday, January 27, 2009

अनजान चेहेरे

एक अनजान चेहरा लाखो की भीड़ मे,
हाथो मे चंद पैसे लिए हुए कुछ खाबों को सजाए।
कितना मजबूर ये अनजान चेहरा जिसे देख हर दिल रो जाए।
कुदरत का फ़ैसला कितना अजीब,
इसका हाथ खाली, जो कुचले इसे गाड़ी के नीचे है धनवान इतना की,
है फ़ैसला बिका उसके हाथों में।
क्यूँ इतना सस्ता ये जीवन बिक रहा रूह के व्यापार में।
कितने हैं ऐसे पुतले मिटटी के जो मर मिटते बिन मातम के।
ऐ अनजान पुतले कितने दिन तेरे बिन छत,
बिन कपड़े और बिन भोजन के निकले।
ढूँढती रही खामोशियाँ तुझे, बिन पाये.
कितने लोग जीते रहे बिन बताये,
तेरा जीवन सूना ही रहा,
गरीबी के आलम में सना हुआ।
यूँ तो हवा भी पहाडों को बनाती और विद्वंश करती है,
तेरी जिंदगी ये कायनात क्यों नही सवारती,
क्यों ये जीती है तेरी ही परछाई के अन्धकार में,
इनकार करते हुए तेरे अस्तित्व का,
वक्त भी तुझ पे ताना मारता है,
तू मिट क्यों नही जाता इस तिरस्कार में,
शायद तुझे अभी भी है आस रौशनी की,
शायद तुझे इन्तजार है सुबह का,
आएगी जो इस काली रात के बाद।
जागेगी काएनात, जिन्दगी होगी तेरी भी जिन्दगी.

Thursday, May 29, 2008

पहचान

फिर बदल गई तस्वीर तेरी, नाम तेरा बदल गया,
तेरे होटो पे जो ग़ज़ल का पैमाना था वोह भी बदल गया,
तेरा ईमान भी बदल गया, बदल गई हर चीज़ वोह, पहचान जिसकी तुजसे थी,
तेरी पहचान, तेरा खुदा, तेरा पता, तेरी मिसाल, सब बदल गया,
एक अनजान था जब तुजसे मिला पहेली बार,
आज बेजान हूँ तुजसे मिलके आखरी बार,
कितनी खूबसूरत तेरी कहानी थी, तेरे आखों मे देखि जो तस्वीर वोह सयानी थी,
खंडहर हो गई वोह तस्वीर, खाबों मे जिसकी नींव तूने बनाई थी,
तेरा जिस्म बदल गया है, तेरी रूह खो गई है,
तेरी पहचान बदल गई है।
ऐ मेरे खुदा इंसान बदल गया है, इंसानियत बदल गई है,
तेरा कलमा पढ़ते थे हम कभी, अब हमारा इमान भी बदल गया है.