जब यूक्रेन पर युद्ध के बदल मँडराने लगे तब वहाँ रह रहे हज़ारों भारतीय विद्यार्थी और उनके माता-पिता चिंतित हो उठे।इस चिंता ने भारत सरकार को भी चिंता में डाल दिया। कुछ विद्यार्थी समय रहते यूक्रेन से निकल गये, परंतु बहुत से इसआस में वहाँ रहते रहे की युद्ध नहीं होगा या हुआ भी तो उनकी पढ़ाई पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। लेकिन उनकी यह आशातब निराशा में बदल गई जब सभी विद्यार्थियों को वहाँ से निकलने की समझायीश दे दी गई और सभी ने निकलना प्रारंभकर दिया।
किसी ने नहीं सोचा था की पढ़ाई के बीच कभी कोई ऐसा व्यवधान हो सकता है या उनके सपनों में कोई ख़लिश आसकती है।
युद्ध ने जहाँ एक ओर यूक्रेन के नागरिकों पलायन प्रारंभ करवाया वहीं दूसरी ओर बहुत से देश अपने नागरिकों को लेकरचिंतित हो उठे जो युद्ध प्रारंभ होने के बाद भी यूक्रेन में रह रहे थे। लेकिन समय रहते भारत सरकार की चिंताओं ने एकअभियान का रूप लिया जिसे हम ऑपरेशन गंगा के नाम से जानते हैं।
इस ऑपरेशन में भारत सरकार ने यूरोप के तमाम देशों और उनमें बसे प्रवासी भारतीयों, भारतीय दूतावासों, भारतीयमंत्रियों, कॉरपोरेट जगत, सामाजिक संगठन एवम् धार्मिक संस्थाओं का आवाहन कर भारतीय विद्यार्थियों को सफलतापूर्वक संकटग्रस्त क्षेत्र से निकाला। यह डायरी उन सभी के प्रयासों की कहानी है जिसमें विद्यार्थियों की तकलीफ़ें एवंउनकी यात्रा है तथा भारत सरकार और असंख्य भारतीयों की विद्यार्थियों की निकासी में भूमिका है जो भारत की सशक्त भारतीयता को प्रदर्शित करती है।
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