Friday, April 12, 2024

वे मकान नहीं घर थे






 

परसों रात मैं रीवा जाने के लिये ट्रेन में बैठा और अगली सुबह सतना पहुँच गया।

 

ट्रेन में कभी अच्छी नींद आती है कभी नहीं। वह रात कुछ अलग थी क्योंकि ट्रेन में एक कोने की सीट मिली थी और इसलिए अंदर आती हुई पहियों की आवाज़ नज़दीक से सुनाई दे रही थी। प्रयास करने पर नींद तो आ गई लेकिन ट्रेन के बार-बार रुकने और झटके लगने से नींद फिर खुल गई। लेकिन फिर भी किसी तरह करवटें बदलकर 4-5 घंटे सो लिया। ट्रेन के सफ़र में इतनी नींद पर्याप्त कही जाती है। 

 

सुबह 6:40 बजे ट्रेन से उतर कर सीधे सतना मेडिकल कॉलेज पहुँच निरीक्षण किया। कॉलेज की अन्य आवश्यकताओं एवं चुनौतियों के संबंध में चर्चा कर मैं आगामी मीटिंग के लिए रीवा निकल गया।

 

रीवा में कॉलेज का निरीक्षण कर, पुराने निर्देशों के कार्यान्वयन की स्थिति और नवीन कार्यों की समीक्षा कर मैं सिंगरौली के लिये रवाना हो गया। सिंगरौली में नवीन मेडिकल कॉलेज का कार्य तेज़ी से चल रहा है। सिंगरौली में मेडिकल कॉलेज की स्थापना से ज़िले एवं आस-पास के इलाक़ों के स्वास्थ्य सूचकांक में तेज़ी से सुधार होना अपेक्षित है। 

 

एक अच्छा शिक्षण संस्थान ना केवल पढ़ने वालों का जीवन बदलता है बल्कि आस-पास के इलाक़ों की अर्थव्यवस्था को भी बदल देता है। मेडिकल कॉलेज स्वास्थ्य सेवाओं में भी इज़ाफ़ा कर देता है। शाम होने से पहले मैं अगले पढ़ाव शहडोल के लिये निकल पड़ा। 

 

सिंगरौली से मझौली का रास्ता एक अलग तरो-ताजगी से भरा हुआ था। ना जाने कब नींद लगी और कब खुली। ऐसा लगा जैसे मैं किसी अलग दुनिया में पहुँच गया हूँ। छोटे-छोटे गाँव, जिनमें बहुत सुंदर मकान बने हुए थे। 

 

घने जंगल से होकर जाते हुए मैंने कुछ मकान देखे जो पर्यावरण के साथ एकरूपता के जीवित प्रमाण हैं। ऐसे घर जो स्थानीय पर्यावरण अनुकूल संसाधनों से बने हैं और उनमें कंक्रीट का कहीं नामो-निशान नहीं मिलता। वे एक ऐसे जीवन की मिशाल देते हैं जिसे जीने की हम केवल कल्पना कर सकते हैं और जिसे बनाने के लिए हमें अत्यधिक संसाधनों का उपयोग करना पड़ता है। उन घरों को देख कर नाना जी का गाँव और घर याद आ गया। मेरा दिल किया कि बस किसी घर में एक दिन के लिए रुक जाया जाए।

 

मिट्टी की दीवारें, दीवारों पर हल्का मिट्टी का रंग जो उन मकानों को प्रकृति से मेल खिला रहा था, घुमावदार कवेलू की छत,, छत की मन-मोहक ढलान, कच्ची बाउंड्री, लकड़ी का सुंदर दरवाज़ा, हर दिशा से समरूप होते हुए वे मकान नहीं थे बल्कि घर थे। 

 

घरों में रहने वाले वे लोग सहायता को आतुर थे और उनके पास अजनबियों के लिए भी पर्याप्त समय और स्नेह था। उनके इस बड़प्पन को देख कर मुझे शहर का जीवन याद कर कुछ लज्जा भी हुई। छोटे लेकिन पर्याप्त, साधारण लेकिन कला के अनूठे प्रयोग, जीवन से ओत-प्रोत वे घर बड़े दिल वालों के थे जो मध्य प्रदेश की कला एवं संस्कृति का प्रतिबिंब हैं।

 

वहीं दूसरी ओर इन कला के केंद्रों के बीच बहुत से पॉवर प्लांट आधुनिकता की एक अलग छाप छोड़ते हैं। परंपरा और आधुनिकता के इस चट-पटे मिश्रण के साथ अपनी विस्मयकारी यात्रा में बस यही सोचता हुआ, दिल में ख़ुशी संजोय मैं आगे बढ़ता गया और जब तेज बारिश के बाद घना अंधेरा छा गया तब रात मैं मझौली में रुक गया।


Sunday, April 7, 2024

प्रत्यक्ष लक्षद्वीप

 





दुनिया में कुछ स्थान ऐसे होते हैं जो दुनिया के एक छोर पर होते हैं लेकिन असल में एक नये जीवन की शुरुआत का केंद्र होते हैं। भारत के एक छोर पर ऐसी ही एक जगह है लक्षद्वीप। हाल ही में मेरा लक्षद्वीप जाना हुआ। जब मैं वहाँ पहुँचा तो मन में सिर्फ़ एक ख़याल था कि यह दुनिया का कोई विस्मयकारी स्थान है। नीला आसमान, हरा, सफ़ेद, नीला, काला एवं ना जाने कौन-कौन से रंग का पानी। इतना साफ़ पानी कि आप गहराई पर समुद्र तल को देख लें। अलौकिक आकर्षण का केंद्र - लक्षद्वीप।

लक्षद्वीप जाना बहुत दुर्गम माना जाता है। यहाँ पहुँचने के लिये कोच्चि सबसे निकटतम स्थान है। कोच्चि के लिए देश के सभी राज्यों से हवाई एवं रेलसेवा उपलब्ध है। कोच्चि से जहाज़ के द्वारा वहाँ पहुँचने में लगभग 16 घंटे लगते हैं। वैसे लक्षद्वीप पहुँचने के लिये अब कोच्चि के अलावा बेंगलुरु से भी फ्लाइट प्रारंभ हो गई है जिससे लक्षद्वीप पहुँचना आसान हो गया है। अगत्ती द्वीप पर हवाई अड्डा है और बड़े जहाज़ के लिये एक छोटा हार्बर भी है। कोच्चि के अलावा मुंबई एवं गोवा से भी लोग यहाँ क्रूज़ में आते हैं।

लक्षद्वीप में बहुत से द्वीप हैं जिनमे बंगाराम सबसे अलौकिक है। वहाँ पहुँचते ही टूरिज्म विभाग के होटल मैनेजर तंसीर ने हमें द्वीप के बारे में बताया और हमारी जिज्ञासा और रोमांच को सातवें असमान पर पहुँचा दिया। यह एक छोटा सा द्वीप है जिसपर कोई स्थानीय आबादी नहीं है। बंगाराम में समुद्री एडवेंचर की सभी गतिविधियों का केंद्र है। जैसे स्नॉर्कलिंग, कयाकिंग, स्कूबा डाइविंग, स्विमिंग, स्पीड बोटिंग इत्यादि। साथ ही द्वीप पर घूमने, साइकिलिंग करने और फोटोग्राफी के लिये पर्याप्त ठिकाने हैं। पहुँचते ही आप समुद्र में छलांग लगाने से स्वयं को नहीं रोक पाते।

इस प्रकार एक टूरिस्ट के नज़ीरिये से समय बिताने के लिए बंगाराम में पर्याप्त व्यवस्था है। हम दरवेश्वरूद्दीन की नाव से अगत्ती से बंगाराम पहुँचे। रास्ते में दरवेश्वरूद्दीन ने हमें कोरल के बारे बताया और मछुआरों की कुछ कहानियाँ सुनाई और ना जाने 1 घंटे का सफ़र कैसे पूरा हो गया।

समुद्री जीवन आपको रोमांचित कर देता है ख़ास तौर से कोरल रीफ एवं विभिन्न प्रकार की मछलियाँ। समुद्र के अंदर की गतिविधियों को भाँपने के लिए स्नॉर्कलिंग एवं स्कूबा डाइविंग सबसे उपयुक्त गतिविधियाँ हैं। अमान ने हमें स्कूबा डाइविंग के हुनर सिखाये और मैं दंग रेह गया जब उन्होंने गहरे समुद्र में मुझे रंग बिरंगी मछलियों के अलावा शार्क, टर्टल और मंटा रे जैसे विशेष जीवों को दिखाया। शार्क देख कर तो मेरी रूह काँप गई लेकिन मन प्रसन्न हो गया। मैंने इसकी कभी कल्पना ही नहीं की थी। 

इन गतिविधियों से मैंने समुद्र और समुद्री जीवन के महत्व को बहुत बारीकी से समझा। लगा कि धरती पर जितनी विविधता है शायद उससे भी अधिक समुद्र के भीतर है। मन में बस यह भाव थे कि पर्यावरण को सुरक्षित रखना कितना आवश्यक है अन्यथा ग्लोबल वार्मिंग से सारे कोरल नष्ट हो जाएँगे और इतने सारे समुद्री जीव भी। जो समुद्र के रहस्यों में दिलचस्वी रखता है ऐसे पर्यावरणविद के लिये भी यह एक आदर्श स्थान है। स्थानीय लोगों का समर्पण और सेवा भाव आपका दिल जीत लेता है।

जितना सुंदर बंगाराम है उतना ही सुंदर अगत्ती भी है और ऐसे ना जाने लक्षद्वीप के कितने अन्य द्वीप। सब पर एक साथ जाना मेरे लिए संभव नहीं था लेकिन आप ज़रूर एक्स्प्लोर कर सकते हैं। अगत्ती एवं कवरत्ती पर रुकने के लिए होमस्टे एवं छोटे कॉटेज़ भी अच्छे विकल्प हैं। यह एक अलग दुनिया महसूस करने के लिए एक आदर्श झरोखा है।

जब पूर्णिमा की रात समुद्र के सामने बैठ मैं चिंतन कर रहा था तब लगा कि समुद्र में हलचल नहीं होती, ज्वार-भाटा नहीं आता तो समुद्र कितना नीरस लगता। बिना लहरों का समुद्र! क्या आप कल्पना कर सकते हैं? शायद नहीं। पानी का निकट आना फिर दूर जाना, पानी का तीव्र होना फिर शांत हो जाना, लहरों का आना और लौटना यह सब चंद्रमा के प्रभाव से होता है। चंद्रमा नहीं होता तो कितना कुछ नहीं होता। 

मुझे लगा कि हम जीवन के उतार-चढ़ाव से कितने प्रभावित होते हैं। परंतु समुद्र की तरह हमारे जीवन में भी उतार-चढ़ाव आवश्यक हैं अन्यथा हमारा जीवन भी ठहरे हुए पानी की तरह बहुत रसहीन हो जाएगा। लक्षद्वीप पर बिताये चंद दिनों का रोमांच तो थम गया था लेकिन कुछ मीठी सी यादों के साथ इस निष्कर्ष को लिए मैं अपने घर लौट रहा था।