5 दिवसीय ट्रेनिंग में मेरा ईशा योग केंद्र पहुँचने का संजोग बना। मैं कोयंबटूर पहुँचा, जहां से ईशा योग केंद्र 30 किमी दूर वेलियंग्री की तलहटी पर सदगुरू द्वारा स्थापित किया गया एक नया जीवन है। शहर को चीरता हुआ रास्ता, पहाड़ों की गोद में ऐसे रमणीय स्थान पर ले जाता है जिसकी मैंने कल्पना ही नहीं की थी।
शाम के अंधेरे में योग केंद्र पर पहुँचकर पता चला कि सुबह ४ बजे सुबह उठना पड़ेगा। थोड़ा घबराते हुए मैंने रात्रि विश्राम किया। मैं अचंभित था जब पूरी अक्षीणता के साथ मेरी नींद खुली और मैंने देखा कि घड़ी में सुबह के 3:58 बज रहे थे। दो मिनट बाद ढोल नगाड़ों ने सुबह के माहौल में और अधिक ऊर्जा का संचार कर दिया। 5 बजे लोग तैयार होकर योगाभ्यास के लिए तैयार थे। कुछ साथियों से भेंट हुई जो बहुत दिनों बाद मिले थे।
जब समय मिलने पर मैं भ्रमण के लिए निकला तब मैंने देखा कि कोई मंदिर के सामने योगाभ्यास कर रहा है, कोई सुंदर मंडप में वैदिक क्रिया कर रहा है, कोई हवन कर रहा है और कोई तालाब के किनारे ध्यान कर रहा है। आगे मैंने स्कूल, लाइब्रेरी एवं एक बड़ा भोजन कक्ष देखा जहां लोग आते, भोजन करते और चले जाते लेकिन कहीं भी गंदगी देखने नहीं मिली।
आवश्यकताओं के लिए सुंदर दुकानें और वह सभी कुछ था वहाँ जो उस आश्रम को पूर्णता प्रदान करता है जैसे कोई छोटा सा स्वावलंबी देश हो। वहाँ मैं 2003 बैच के एक सीनियर आईएएस, अम्बरीश कुमार से मिला जिन्होंने तीन वर्ष के लिए अपनी सेवाएँ ईशा फाउंडेशन को दे दी है। मैं आश्चर्यचकित था। वे ईशा आउटरीच के प्रोजेक्ट डायरेक्टर हैं। देखने में एक साधारण संन्यासी लेकिन उनके विचार आकाश की ऊँचाइयों वाली प्रेरणा देने वाले थे।
ट्रेनिंग में आये प्रतिभागियों के लिए रुकने और भोजन के लिए अलग स्थान था। भोजन ऐसा था जिसमें सभी आवश्यक पोषक तत्वों का समावेश था। भोजन साधारण होते हुए भी ऐसा था कि स्वाद आपको आनंदित कर दे एवं जिसे ग्रहण कर कभी कोई भारीपन ना लगे। चुकंदर, गाजर, ककड़ी, सर्पगंधा इत्यादि की सलाद, नारियल चावल, दही लौकी, सब्ज़ियों का जूस, मूँगफली की खिचड़ी, धनिया की कॉफ़ी इत्यादि भोजन के कुछ विशेष व्यंजन थे।
इनर इंजीनियरिंग के योग कार्यक्रम में हम प्रतिदिन कुछ सीख रहे थे। सुबह दोपहर और शाम योग ध्यान में बीत रहा था एवं प्रतिदिन कुछ नया करने के लिए एक नई गतिविधि रहती थी जो आनंद की असीम व्यक्तिगत अनुभूति करा रही थी एवं जिज्ञासा को लगातार बांधे हुए थी। पहले दिन योग क्लास के बाद शाम को तीर्थकुण्ड में डुबकी लगाकर मन तरबतर हो गया। कुंड के ठंडे पानी ने शरीर को पूरी तरह हल्का कर दिया।
अगले दिन शाम को ध्यानलिंग पहुँच कर अनंत के स्पंदन ने मन को समस्त विकारों से दूर शून्य की ओर धकेल दिया। फिर शाम को लिंग भैरवी में आरती और दीपों के प्रकाश ने मन के प्रत्येक कोने को प्रज्वलित कर दिया। जब चाँदनी रात में हम लोग 112 फीट ऊँची अदियोगी की प्रतिमा के पास पहुँचे तो ऐसा लगा जैसे वह प्रतिमा जीवंत हो उठी हो।
कभी हम सदगुरु से मिले तो कभी उनका सत्संग सुना। कभी हमने पूरे आश्रम को घूम कर देखा तो कभी योग सिखाने वाले स्वयंसेवियों ने मैदान में भरपूर खेल खिलाए। दौड़, फुटबॉल, बास्केट बॉल, टिप्पू इत्यादि खेल कर लगा जैसे हम बचपन में लौट गये हों। प्रतिदिन नित नए दर्शन होते चले गये और पता नहीं कैसे स्पंद हॉल में लगातार चली योग क्लास में हमने शांभवी महामुद्रा ध्यान पद्यति सीख ली।
जब मैंने वापसी की यात्रा प्रारंभ की तो देखा कि ख़ाली हाथ योग केंद्र पहुँचे लोग, तन-मन की शुद्धि कर एक बहुमूल्य उपहार लेकर लौट रहे थे। ईशा फाउंडेशन कोयंबटूर कोई साधारण स्थान नहीं बल्कि जीवन के आनंद की खोज का एक विशेष पड़ाव है।









