Saturday, February 24, 2024

लाइफ एट ईशा …

 





5 दिवसीय ट्रेनिंग में मेरा ईशा योग केंद्र पहुँचने का संजोग बना। मैं कोयंबटूर पहुँचा, जहां से ईशा योग केंद्र 30 किमी दूर वेलियंग्री की तलहटी पर सदगुरू द्वारा स्थापित किया गया एक नया जीवन है। शहर को चीरता हुआ रास्ता, पहाड़ों की गोद में ऐसे रमणीय स्थान पर ले जाता है जिसकी मैंने कल्पना ही नहीं की थी। 


शाम के अंधेरे में योग केंद्र पर पहुँचकर पता चला कि सुबह ४ बजे सुबह उठना पड़ेगा। थोड़ा घबराते हुए मैंने रात्रि विश्राम किया। मैं अचंभित था जब पूरी अक्षीणता के साथ मेरी नींद खुली और मैंने देखा कि घड़ी में सुबह के 3:58 बज रहे थे। दो मिनट बाद ढोल नगाड़ों ने सुबह के माहौल में और अधिक ऊर्जा का संचार कर दिया। 5 बजे लोग तैयार होकर योगाभ्यास के लिए तैयार थे। कुछ साथियों से भेंट हुई जो बहुत दिनों बाद मिले थे। 

जब समय मिलने पर मैं भ्रमण के लिए निकला तब मैंने देखा कि कोई मंदिर के सामने योगाभ्यास कर रहा है, कोई सुंदर मंडप में वैदिक क्रिया कर रहा है, कोई हवन कर रहा है और कोई तालाब के किनारे ध्यान कर रहा है। आगे मैंने स्कूल, लाइब्रेरी एवं एक बड़ा भोजन कक्ष देखा जहां लोग आते, भोजन करते और चले जाते लेकिन कहीं भी गंदगी देखने नहीं मिली। 

आवश्यकताओं के लिए सुंदर दुकानें और वह सभी कुछ था वहाँ जो उस आश्रम को पूर्णता प्रदान करता है जैसे कोई छोटा सा स्वावलंबी देश हो। वहाँ मैं 2003 बैच के एक सीनियर आईएएस, अम्बरीश कुमार से मिला जिन्होंने तीन वर्ष के लिए अपनी सेवाएँ ईशा फाउंडेशन को दे दी है। मैं आश्चर्यचकित था। वे ईशा आउटरीच के प्रोजेक्ट डायरेक्टर हैं। देखने में एक साधारण संन्यासी लेकिन उनके विचार आकाश की ऊँचाइयों वाली प्रेरणा देने वाले थे।

ट्रेनिंग में आये प्रतिभागियों के लिए रुकने और भोजन के लिए अलग स्थान था। भोजन ऐसा था जिसमें सभी आवश्यक पोषक तत्वों का समावेश था। भोजन साधारण होते हुए भी ऐसा था कि स्वाद आपको आनंदित कर दे एवं जिसे ग्रहण कर कभी कोई भारीपन ना लगे। चुकंदर, गाजर, ककड़ी, सर्पगंधा इत्यादि की सलाद, नारियल चावल, दही लौकी, सब्ज़ियों का जूस, मूँगफली की खिचड़ी, धनिया की कॉफ़ी इत्यादि भोजन के कुछ विशेष व्यंजन थे।

इनर इंजीनियरिंग के योग कार्यक्रम में हम प्रतिदिन कुछ सीख रहे थे। सुबह दोपहर और शाम योग ध्यान में बीत रहा था एवं प्रतिदिन कुछ नया करने के लिए एक नई गतिविधि रहती थी जो आनंद की असीम व्यक्तिगत अनुभूति करा रही थी एवं जिज्ञासा को लगातार बांधे हुए थी। पहले दिन योग क्लास के बाद शाम को तीर्थकुण्ड में डुबकी लगाकर मन तरबतर हो गया। कुंड के ठंडे पानी ने शरीर को पूरी तरह हल्का कर दिया।

अगले दिन शाम को ध्यानलिंग पहुँच कर अनंत के स्पंदन ने मन को समस्त विकारों से दूर शून्य की ओर धकेल दिया। फिर शाम को लिंग भैरवी में आरती और दीपों के प्रकाश ने मन के प्रत्येक कोने को प्रज्वलित कर दिया। जब चाँदनी रात में हम लोग 112 फीट ऊँची अदियोगी की प्रतिमा के पास पहुँचे तो ऐसा लगा जैसे वह प्रतिमा जीवंत हो उठी हो। 

कभी हम सदगुरु से मिले तो कभी उनका सत्संग सुना। कभी हमने पूरे आश्रम को घूम कर देखा तो कभी योग सिखाने वाले स्वयंसेवियों ने मैदान में भरपूर खेल खिलाए। दौड़, फुटबॉल, बास्केट बॉल, टिप्पू इत्यादि खेल कर लगा जैसे हम बचपन में लौट गये हों। प्रतिदिन नित नए दर्शन होते चले गये और पता नहीं कैसे स्पंद हॉल में लगातार चली योग क्लास में हमने शांभवी महामुद्रा ध्यान पद्यति सीख ली। 

जब मैंने वापसी की यात्रा प्रारंभ की तो देखा कि ख़ाली हाथ योग केंद्र पहुँचे लोग, तन-मन की शुद्धि कर एक बहुमूल्य उपहार लेकर लौट रहे थे। ईशा फाउंडेशन कोयंबटूर कोई साधारण स्थान नहीं बल्कि जीवन के आनंद की खोज का एक विशेष पड़ाव है। 

Saturday, February 17, 2024

सूर्य की पहली किरण का मंदिर - कोणार्क





 सूर्य मंदिर ओड़िशा के समुद्र तट पर पुरी शहर से लगभग 35 किलोमीटर उत्तर पूर्व में 13वीं शताब्दी का मंदिर है। इसके निर्माण का श्रेय पूर्वी गंगावंश के राजा नरसिंह देव प्रथम को दिया जाता है। आप तेरहंवी सदी के राजा की दूरगामी सोच को महसूस करें। सृष्टि की ऊर्जा का केन्द्र सूर्य का मंदिर। इसे देखने की उत्सुकता हमें मंदिर तक ले आई। 

सूर्य मंदिर दक्षिण अमेरिका से लेकर अफ़्रीका और चीन तक बनाये गये। भारत में भी कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सूर्य मंदिरों का निर्माण हुआ। 

पत्थरों को तराश कर बनाया गया यह एक विशाल मंदिर है जिसमें बहुत से भव्य द्वार और विशाल मूर्तियाँ हैं। मूर्तिकला के माध्यम से यह जीवन के सार को प्रदर्शित करता है। रचनात्मकता एवं कलाकृति की दृष्टि से यह अद्भुत है।  


कोणार्क सूर्य मंदिर के निर्माण में दिशाओं का इस प्रकार से विशेष ध्यान रखा गया है कि किसी भी ऋतु में केवल सूर्य की किरणों से समय का अनुमान लगाया जा सके। इसके अलावा मंदिर में रथ के जो पहिये बने हैं वे जीवन के विभिन्न चरणों को दर्शाते हैं। 


कोणार्क पहुँचने पर मन में एक सवाल आया - भारत के इतने महत्वपूर्ण कला और विज्ञान के प्रतीक के बारे में स्कूल में हमें विस्तार से क्यों नहीं पढ़ाया गया जबकि कई और निरर्थक स्मारकों को पाठ्यक्रम में ज़्यादा महत्व दिया गया। कई ऐसे जो इतनी योग्यता भी नहीं रखते और जो केवल लोगों के दुखों की कहानियाँ सुनाते हैं। यह मंदिर सकारात्मक ऊर्जा का भंडार है। इस सूर्य मंदिर पर तो पीएचडी की पूरी थीसिस लिखी जा सकती है। 


मेरे बच्चों ने जब इसे देखा तब वे अत्यधिक प्रसन्न हुए और उत्साह से सराबोर होकर उन्होंने मुझसे ढेरों सवाल किए। प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर पाकर वे फोटोग्राफी में व्यस्त हो गये और मैं कला के विशाल समुद्र में गोते लगाने लगा। उनके सवालों से मुझे आभास हुआ कि प्रत्येक बच्चे को इसके बारे में जानना कितना आवश्यक है। स्कूल के पाठ्यक्रम में इसके बारे में और अधिक विस्तार से पढ़ाने की आवश्यकता है क्योंकि यह जिज्ञासा पैदा करता है और बच्चों में वैज्ञानिक सोच विकसित करने में बहुत सहायक है।


सूर्य मंदिर वो अनूठा स्थान है जहां आस्था और विज्ञान का समागम होता है। यह हमारी संस्कृति की वास्तविक सोच और कला का एक और उत्कृष्ठ उदाहरण है।

Wednesday, February 14, 2024

अब भव्य हिंदू मंदिर यूनाइटेड अरब एमिरात में

 




photo courtesy - x @AbuDhabiMandir

अब हम अचंभित करने वाली भविष्य में ऐसी और कल्पनाओं को साकार होते भी देख सकते हैं जैसे कि इस्लामिक गणराज्य में हिंदू मंदिर स्थापित होना जो मूर्तिकला का एक अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत करता है। अब यह एक चमत्कार ही कहा जा सकता है कि एक मुस्लिम देश में यह विशाल हिंदू मंदिर धर्म, आस्था, कला और अद्यात्म का एक नया केंद्र बनने जा रहा है। 

अबू धाबी के निकट स्वामी नारायण संस्था द्वारा बनाए जा रहे हिंदू मंदिर का भूमिपूजन प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सन् 2018 में किया था। अब यह मंदिर बनकर तैयार है एवं इसका लोकार्पण आज प्रधानमंत्री मोदी जी के द्वारा किया जाना है। 

कैसे नरेंद्र मोदी जी ने मुस्लिम शासकों को अबू धाबी में हिंदू मंदिर बनवाये जाने के लिये प्रेरित किया होगा? विचार करें। और कैसे स्वामी जी ने भारत के स्वाभिमान को वहाँ स्थापित करने के लिए जतन किए होंगे। यह मरुस्थल में एक मरीचिका की तरह लगता है।

मैं अपनी किताब के लिए स्वामी ब्रह्मविहारी जी से मिला था। मैंने साक्षात्कार के समय उनके व्यक्तित्व की गहराई को जाना था और इसीलिए यह भी कहना ग़लत नहीं होगा कि इस ऐतिहासिक कार्य के पीछे स्वामी नारायण संस्था के स्वामियों एवं उनके अध्यात्म की शक्ति का विशेष योगदान है, अन्यथा किसी का विश्वास जीतना आसान नहीं होता और धर्म के विषय में तो बिलकुल भी नहीं। 

यह मंदिर जहां एक ओर इस्लाम की उदारता को उजागर करता है वहीं दूसरी ओर संस्था के कौशल एवं सामर्थ को दर्शाता है। मंदिर की भव्यता संस्था की रचनात्मकता, अखंडता, गंभीरता, संवेदनशीलता एवं चरित्र की विशालता को दर्शाती है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं की शीघ्र ही इस मंदिर को देखने लाखों लोग वहाँ पहुँचने लगें।

तो क्या यूं कहें की रेत में भी कमल खिलाए जा सकते हैं।